Tuesday, July 02, 2013

आज़ ज़ज्बातों को गंगा में बहा आया हूँ

आज़ ज़ज्बातों को गंगा में बहा आया हूँ,
टूटे ख़्वाबों को मैं खुद ही ज़ला आया हूँ.

अब न पैरों में चुभेंगी यादों की किरचें,
मैं उन्हें उनको ही सौगात में दे आया हूँ.

अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ.

मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

...कैलाश शर्मा 

54 comments:

  1. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ....
    निशब्द करती रचना
    सादर ....

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  2. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

    बेहतरीन नज़्म लाजवाब
    sir ji aap mere reading list men wirajman hain

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  3. वाह बहुत ही मार्मिक गजल, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  4. मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
    बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

    अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.
    बेहतरीन .

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  5. मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
    बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

    अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.
    bahut dard bhara hai

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  6. मन के भाव स्पष्ट व्यक्त होते हुये।

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  7. जग का दर्द ..दिल के हवाले से ....

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  8. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.
    .........खूबसूरत भाव बेहतरीन प्रस्तुती

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  9. बढ़िया प्रस्तुति
    आभार आदरणीय \-

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  10. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (03-07-2013) के .. जीवन के भिन्न भिन्न रूप ..... तुझ पर ही वारेंगे हम .!! चर्चा मंच अंक-1295 पर भी होगी!
    सादर...!
    शशि पुरवार

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  11. खुबसूरत अभिवयक्ति......

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  12. मन को छूती हुई सुंदर अनुभूति
    बेहतरीन रचना
    बधाई

    जीवन बचा हुआ है अभी---------

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  13. अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
    साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ.

    मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
    बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

    बहुत खूबसूरती से लिखे एहसास ...

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  14. बहुत सुंदर रचना, शुभकामनाये

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  15. बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति .......!!

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  16. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

    बहुत खूबसूरत गज़ल कही है कैलाश जी ! हर शेर दिल के जज्बातों को शिद्दत से बयान कर रहा है ! बहुत खूब !

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  17. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

    बहुत बढ़िया गजल

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  18. सर जी ,बेहतरीन प्रस्तुति, खूबसूरत गज़ल

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  19. bahut sundar....khubsoorat gazal...

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  20. बहुत सुंदर रचना, खुबसूरत एहसास ...

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  21. मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
    बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

    bahut sundar .....hr sher lajbab .

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  22. अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
    साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ....

    लाजवाब शेर ... तन्हाइयां ही हम सफर हों तो उम्र भर का साथ हो जाता है ...

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  23. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

    निःशब्द करती नज़्म

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  24. बेहद उम्दा शेर...मौन की भाषा कम ही समझ आती है..

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  25. मन को पत्‍थर से बदल आया हूँ.......बहुत बढ़िया।

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  26. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

    वाह....इस शेर के लिए खास दाद कबूल करें।

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  27. मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
    बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

    बहुत सुंदर ...

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  28. सुन्दर रचना कैलाश जी,आभार।

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  29. बहुत-बहुत-बहुत...ही सुंदर!
    एक-एक शेर दिल को छू कर गुज़र गया.....
    ~सादर!!!

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  30. अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
    साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ.
    अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

    बहुत ही उम्दा शेरो से लिखी ग़ज़ल शुक्रिया कैलाशजी.

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  31. kailash ji

    sundar rachna

    एक चटका यहाँ भी लगाइये :
    http://raaz-o-niyaaz.blogspot.com/2013/07/blog-post.html

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  32. ज़बरदस्त ग़ज़ल बनी है.

    अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
    साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ.

    बहुत बढ़िया शेर लगा.

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  33. मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
    बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

    बहुत बढ़िया एहसास ...

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  34. Behatarin kavita..Mujhe blog ka headline behad pasand aaya: अश्रु क्या है ? दर्द की मुस्कान है. पीर क्या है ? प्यार का प्रतिदान है. जी रहे हैं सब जीने का अर्थ जाने बिना, ज़िन्दगी क्या है ? मृत्यु का अहसान है.
    Kya bat hai..

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  35. अति सुंदर...

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  36. बहुत ही बढियां गजल..
    लाजवाब...
    :-)

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  37. सुन्दर पंक्तियां समेटे हुए !

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  38. मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
    बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

    बेहतरीन पंक्तियाँ! बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति.
    सादर
    मधुरेश

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  39. अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
    साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ.

    बहुत ही लाजवाब गजल. सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  40. एक से बढ़कर एक शेर

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  41. आदरणीय कैलाश जी बहुत सुन्दर काव्य रचना....

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  42. आदरणीय कैलाश जी बहुत सुन्दर काव्य रचना....

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  43. अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
    आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

    वाह!

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  44. बहुत सुन्दर

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