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Friday, March 22, 2013

क्षणिकाएं


   (१)
ज़िन्दगी की क़िताब      
पीले पड़ गए पन्ने 
चाहता हूँ पढ़ना
एक बार फ़िर.

लगता है डर
पलटने में पन्ने,
कहीं बिखर न जायें
भुरभुरा कर
और बिखर जायें यादें
फिर चारों ओर.

   (२)
मत उछालो       
मेरे अहसासों को
समझ पत्थर,
ग़र टूटे फ़िर  
चुभने लगेंगे दिल में
किरचें बन कर.

   (३)
अब मेरे अहसास
न मेरे बस में,
देख कर तुमको
न जाने क्यूँ
ढलना चाहते 
शब्दों में.

   (४)
 तुम्हारा मौन
उठा देता तूफ़ान
मन के शांत सागर में,
अब तो कर दो
इसे मुखर
कुछ पल को.

   (५)
डूब रहा अंतर्मन           
मौन के समंदर में,
अब तो प्रिय कुछ पल को
मौन मुखर होने दो.

...कैलाश शर्मा