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Sunday, November 17, 2013

हाइकु/तांका

  (१)
कौन है जिंदा     
शहर कब्रस्तान 
दफ़न ख़्वाब.

 (२)
ख्वाबों की लाश      
कन्धों पर ढो रहा
जिंदा है कैसे?

  (३)
मन का पंछी    
बेचैन उड़ने को 
घायल पंख.

  (४)
मन का पंछी           
बंधा रिश्ते डोर में
तोड़ न पाए.

  (५)
आत्मा है पंछी         
कब है बाँध पाया
शरीर इसे.

  (६)
क्या है तुम्हारा       
किस पर गुमान
छोड़ जाना है.

  (७)
बांटते जाना        
अंतर्मन से प्यार
असली खुशी.

  (८)
जीना ज़िंदगी      
टुकड़ों टुकड़ों में
मुश्किल होता. 

  (९)   
सुनेगा कौन          
अहसास दिल के
मुर्दों के बीच
इंसान नहीं जिंदा
हैवानों का है राज.

  (१०)
राह के कांटे          
चुनते चलो तुम
होगा आसान
पीछे आने वालों को
राहों पर चलना.

.....कैलाश शर्मा 

Monday, December 10, 2012

माता-पिता (तांका)

    (१)
माँ का जीवन
समर्पित बच्चों को 
पर बुढापा
गुज़रता अकेला 
अनजान कोने में.

    (२)
जीवनदात्री 
गोदी थी सुरक्षित 
आज वही माँ
ढूँढती एक कांधा
पल भर रोने को.

    (३)
जलती सदां 
परिवार चिंता में,
मगर रोटी 
कभी नहीं जलती 
बनी माँ के हाथों की.

    (४)
न शिकायत 
न शिकन माथे पे 
वह माँ ही है 
भगवान का रूप
उत्कृष्ट वरदान.

    (५)
माँ की ममता 
नहीं कोई तुलना,
गर दो रोटी 
कह देती बेटे से 
मैंने खाना खा लिया.

    (६)
धुंधली आँखें
लड़खड़ाते पैर 
कांपते हाथ
थे सहारा सबका 
ढूँढ़ते एक कांधा.

    (७)
कंधे पे बैठे 
झूले झूला बांहों में,
आज वो पिता 
ढूँढता वो उंगली 
छूट गयी हाथ से.

    (८)
पिता का दर्द 
समझा है किसने 
टूटा है दिल
आँखों में नहीं आंसू 
दिल हुआ प्रस्तर. 

© कैलाश शर्मा