Showing posts with label ध्यान योग. Show all posts
Showing posts with label ध्यान योग. Show all posts

Monday, August 20, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (२८वीं-कड़ी)

छठा अध्याय 
(ध्यान-योग- ६.३७-४७) 

अर्जुन 

होकर श्रद्धावान भी जो जन,
चंचल मन से विचलित होता.
तो वह किस गति को पाता है
योग सिद्धि जब प्राप्त न होता.  (३७)

भ्रष्ट कर्म, ज्ञान दोनों ही पथ से
क्या वह नहीं निराश्रय होता?
क्या ब्रह्ममार्ग में मोहित साधक
छिन्न भिन्न बादल सम होता?  (३८)

कृष्ण! नहीं कोई समर्थ है
जो यह संशय दूर कर सके.
सिर्फ आपके और न दूजा,
जो यह संशय नष्ट कर सके.  (३९)

श्री भगवान 

लोक परलोक दोनों में अर्जुन,
उसका नाश नहीं है होता.
जो जन शुभ कर्मों को करता,
दुर्गति प्राप्त कभी न होता.  (४०)

लोक पुण्य आत्माओं का पाकर,
योग भ्रष्ट वहाँ रहता है.
पुनः पवित्र धनिकों के घर में 
वर्षों बाद जन्म पाता है.  (४१)

गुणी योगनिष्ठों के घर में,
अथवा जन्म प्राप्त करता है.
दुर्लभ अत्यंत लोक में होता,
ऐसा जन्म प्राप्त करता है.  (४२)

पूर्व जन्म में अर्जित बुद्धि 
पुनः प्राप्त वहां है करता.
पहले से ज्यादा प्रयत्न से
मोक्ष प्राप्ति में है लगता.  (४३)

पूर्वाभ्यास योग के कारण,
योगसाधना आकर्षित करता.
समत्व योग का जिज्ञासु वह,
शब्द ब्रह्म को पार है करता.  (४४)

यत्नपूर्व कोशिश कर योगी,
पाप रहित, शुद्ध हो जाता.
जन्मान्तरों में सिद्धि पाकर,
अंत परम गति को है पाता.  (४५)

श्रेष्ठ है योगी तप साधक से,
ज्ञानी से भी श्रेष्ठ है योगी.
श्रेष्ठ अग्निहोत्री से भी वह,
अर्जुन तुम बन जाओ योगी.  (४६)

ऐसे समस्त योगियों में भी जो
अंतर्मन से आसक्त है मुझ में.
श्रद्धायुक्त जो मुझको भजता,
सब से श्रेष्ठ है वह मेरे मत में.  (४७)

               .......क्रमशः

*****छठा अध्याय समाप्त***** 

कैलाश शर्मा 

Thursday, August 16, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (२७वीं-कड़ी)

छठा अध्याय
(ध्यान-योग - ६.२६-३६) 


चंचल मन हो कर आकर्षित,
जब विचलित हो इधर उधर.
लौटा कर के उसे वहाँ से, 
उसे आत्म में ही स्थिर कर.  (२६)

रज गुण से जो मुक्त हो गया,
पूर्ण शान्त उसका मन होता.
है पाप रहित ऐसा जो योगी 
उत्तम सुख को प्राप्त है होता.  (२७)

मन को करके ऐसे वश में,
आत्मा में एकाग्र है करता.
पाप रहित ऐसा वह योगी,
परम मोक्ष का सुख लभता.  (२८) 

एकाग्र चित्त, समदृष्टि योगी,
आत्मा अपनी देखे सब जन में.
भेद भाव से रहित है हो कर, 
सर्व सृष्टि देखे निज मन में.  (२९)

मुझको देखे प्राणिमात्र में,
प्राणिमात्र मुझमें है देखता.
न अदृश्य मैं होता उसको,
वह अदृश्य न मुझसे रहता.  (३०)

सब जन में स्थित जो मुझको
बिना भेद भाव के है भजता.
सर्व कर्म करता वह योगी, 
मुझ में ही निवास है करता.  (३१)

सुख प्रिय दुःख अप्रिय मुझको,
वैसे ही अर्जुन औरों को होता.
अपने सदृश्य देखता सबको,
परम श्रेष्ठ योगी है वह होता.  (३२)

अर्जुन

हे मधुसूदन! समभाव योग है
दीर्घ काल क्या स्थिर होगा?
मन की चंचलता के कारण
कैसे स्थिर स्थिति में होगा?  (३३)

तन व इन्द्रिय क्षुब्ध है करता,
मन स्वभाव से ही चंचल है.
निग्रह इस बलवान चित्त का,
वायु बांधने सम मुश्किल है.  (३४)

श्री भगवान

निश्चय कठिन है मन वश करना,
यह है बहुत ही चंचल अर्जुन.
लेकिन अभ्यास वैराग्य के द्वारा,
इसका निग्रह भी है संभव.  (३५)

नहीं संयमित चित्त है जिसका,
कठिन बहुत यह योग है पाना.
आत्मा पर जिसका वश होता,
संभव योग इस युक्ति से पाना.  (३६)

              .......क्रमशः

कैलाश शर्मा