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Saturday, December 22, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (४२वीं कड़ी)

   
        दसवां अध्याय
(विभूति-योग -१०.२९-४२) 


नागों में मैं शेषनाग हूँ,
और वरुण जलचरों में हूँ.
पितरों में अर्यमा है जानो 
नियमपालकों में मैं यम हूँ.  (१०.२९)

दैत्यों में प्रहलाद है जानो,
और समयगणकों में काल हूँ.
सिंह सभी पशुओं में जानो,
और गरुण सभी पक्षियों में हूँ.  (१०.३०)

पावन करने वालों में वायु हूँ,
राम शस्त्रधारियों में जानो.
मगर हूँ मैं सभी मत्स्यों में,
नदियों में गंगा तुम जानो.  (१०.३१)

आदि, अंत, मध्य सृष्टि का
मुझको ही अर्जुन तुम जानो.
विद्या में अध्यात्म ज्ञान हूँ,
वाद-विवाद में वाद है जानो.  (१०.३२)

मैं ही अकार अक्षरों में हूँ,
द्वंद्व समास समासों में हूँ.
अक्षय काल मुझे ही जानो,
सर्वतोमुखी विधाता मैं हूँ.  (१०.३३)

सर्व संहारक मृत्यु भी मैं हूँ,
और भविष्य का उद्गम भी मैं.
कीर्ती, श्री, वाणी, मेघा नारी में,
स्मृति, धृति और क्षमा भी मैं.  (१०.३४)

व्रहत्साम साम मन्त्रों में,
छंदों में गायत्री भी मैं हूँ.
मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ,
मैं वसन्त ऋतुओं में हूँ.  (१०.३५) 

द्यूत हूँ मैं छल करनेवालों में,
तेजस्वियों का तेज भी मैं हूँ.
मैं ही विजय और उद्यम हूँ,
सात्विकजन का सत्व भी मैं हूँ.  (१०.३६)

मैं यादवों में वासुदेव हूँ
और धनञ्जय पांडवों में.
मुनियों में व्यासमुनि मैं,
शुक्राचार्य हूँ मैं कवियों में.  (१०.३७)

दंड दमन करने वालों का,
नीति विजय इक्षुक में हूँ.
गुह्यभाव में मौन हूँ मैं,
ज्ञान ज्ञानियों का मैं हूँ.  (१०.३८)

जो भी बीज सर्व प्राणी का
मुझको ही वह अर्जुन जानो.
नहीं चराचर जग में कुछ भी
मेरे बिना जो रह सकता हो.  (१०.३९)

दिव्य विभूतियों का मेरी
कोई अंत नहीं है अर्जुन.
जो कुछ मैंने तुम्हें बताया,
वह तो है संक्षेप में वर्णन.  (१०.४०)

ऐश्वर्य, सोंदर्य और शक्ति से  
देखो संपन्न है जिस प्राणी को.
उत्पन्न मेरे तेजस्वी अंश से 
समझो तुम उस उस प्राणी को.  (१०.४१)

इससे अधिक और कुछ ज्यादा
जान करोगे क्या तुम अर्जुन?
मैं हूँ स्थित सम्पूर्ण विश्व में
करके व्याप्त एक अपना कण.  (१०.४२)

**दसवां अध्याय समाप्त**

                  .....क्रमशः

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कैलाश शर्मा 

Friday, November 30, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (४०वीं कड़ी)


      दसवां अध्याय 
(विभूति-योग -१०.८-१८) 



मैं सम्पूर्ण सृष्टि का कारण
मुझसे ही सब कुछ है चलता.
ऐसा लेकर भाव है ज्ञानी 
प्रेम पूर्वक मुझको है भजता.  (१०.८)

मुझमें मन को स्थिर करके 
जीवन मुझे हैं अर्पण करते.
मेरा ज्ञान परस्पर दे कर 
वे मेरे वर्णन में ही हैं रमते.  (१०.९)

है आसक्त चित्त मुझमें ही 
मुझ को प्रेम पूर्वक भजते.
देता उनको बुद्धि योग मैं,
जिससे प्राप्त मुझे वे करते.  (१०.१०)

करने को मैं अनुग्रह उन पर
आत्म भाव में स्थिर रह कर.
अज्ञान अँधेरा नष्ट हूँ करता
ज्ञान रूप का दीप जला कर.  (१०.११)

अर्जुन 

आप परब्रह्म, परम धाम हैं,
आप सनातन, परम पवित्र हैं.
दिव्य, अजन्मा, आदि देव हैं,
कृष्ण आप सर्वत्र व्याप्त हैं.  (१०.१२)

सभी ऋषि व देवर्षि नारद
व्यास, असित, देवल हैं कहते.
वही तत्व आपका माधव 
आप स्वयं भी मुझको कहते.  (१०.१३)

हे केशव! जो आप कह रहे,
उस सबको हम सत्य मानते.
किन्तु आपके इस वैभव को 
देव या दानव नहीं जानते.  (१०.१४)

प्राणिजगत के सृजक व स्वामी,
देवाधिदेव, जगत के पालक.
अपने आप को अपने द्वारा 
केवल स्वयं जानते हैं हे माधव!  (१०.१५)

दिव्य विभूतियाँ हैं जो आपकी
केवल आप ही हैं कह सकते.
जिनसे लोक व्याप्त है करके
आप हैं इसमें स्थिर रहते.  (१०.१६)

चिंतन काल में हे योगेश्वर!
कैसे पहचानूँ मैं आपको?
किन किन स्वरुप भावों में
ध्यान करूँ मैं सदा आपको?  (१०.१७)

स्व विभूतियों और योग को
विस्तारपूर्व कहो तुम मुझ को.
तृप्ति नहीं होती है मन की 
सुनकर इन अमृत वचनों को.  (१०.१८)

कैलाश शर्मा