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Monday, April 20, 2015

सीढ़ियां

बढ़ते ही कुछ आगे सीढ़ियों पर 
हो जाते विस्मृत संबंध व रिश्ते,
निकल जाते अनज़ान हो कर
बचपन के हमउम्र साथियों से 
जो खेल रहे क्रिकेट
नज़दीकी मैदान में।

खो जाती स्वाभाविक हँसी
बनावटी मुखोटे के अन्दर,
खो जाता अन्दर का छोटा बच्चा
अहम् की भीड़ में।
विस्मृत हो जातीं पिछली सीढ़ियां
जिनके बिना नहीं अस्तित्व
किसी अगली सीढ़ी का।

कितना कुछ खो देते
अपने और अपनों को,
आगे बढ़ने की दौड़ में।

...कैलाश शर्मा