(चित्र गूगल से साभार)
क्यों पसरती जा रही
हैवानियत इंसानों
में,
क्यों घटता जा रहा
अंतर
मानव और दानव में,
क्यों हो गया मानव
घृणित दानव
से भी?
भूल गया सभी रिश्ते और
उम्र
दिखाई देती केवल एक
देह,
बेमानी हो गए शब्द
प्रेम, वात्सल्य और
स्नेह,
आँखों में है केवल
भूख
झिंझोड़ने की एक देह,
कानून व्यवस्था सब
बेमानी
बंधी हुई है पट्टी
आँखों पर,
देखने तमाशा जुड़
जाती भीड़
पर बढ़ता नहीं कोई
हाथ
करने को सामना.
नहीं आयेगी कोई
दुर्गा
करने दानव दलन,
उठना होगा तुम्हें ही
बनना होगा दुर्गा
करने दानवों का शमन,
उठाओ खड्ग और खप्पर
पीने को लहू इन रक्तबीजों का,
गिरने न पाए लहू की
एक बूँद भी पृथ्वी पर,
पैदा न हो पाए फिर कोई
रक्तबीज धरा पर.
पीने को लहू इन रक्तबीजों का,
गिरने न पाए लहू की
एक बूँद भी पृथ्वी पर,
पैदा न हो पाए फिर कोई
रक्तबीज धरा पर.
......कैलाश शर्मा
