तोडती है पत्थर , तपती हुई धूप में,
कौन आग तेज़ है,पेट की या धूप की .
मेहनत के प्रतिफल से पेट नहीं भर पाया,
जिसने तन को बेचा दुनिया ने ठुकराया,
दोनों ने श्रम बेचा, किसको हम पाप कहें,
दोनों के श्रम पीछे, मज़बूरी थी भूख की.
बचपन सूना सूना, यौवन न गदराया,
यौवन के चहरे पर वृद्धापन गहराया,
नयन के झरोखे से स्वप्न झांकते रहे,
निशा भी चली गयी राह तकते नींद की.
अवगुण छुप जाते,सौने की ज़गमग में,
अनचाहा भार बना,यौवन उसको पग में,
पद्मिनी तुम्हें हर युग में ज़लना ही होगा,
चाहे दहेज़ के नाम, सजा या रूप की.
कौन आग तेज़ है,पेट की या धूप की .
मेहनत के प्रतिफल से पेट नहीं भर पाया,
जिसने तन को बेचा दुनिया ने ठुकराया,
दोनों ने श्रम बेचा, किसको हम पाप कहें,
दोनों के श्रम पीछे, मज़बूरी थी भूख की.
बचपन सूना सूना, यौवन न गदराया,
यौवन के चहरे पर वृद्धापन गहराया,
नयन के झरोखे से स्वप्न झांकते रहे,
निशा भी चली गयी राह तकते नींद की.
अवगुण छुप जाते,सौने की ज़गमग में,
अनचाहा भार बना,यौवन उसको पग में,
पद्मिनी तुम्हें हर युग में ज़लना ही होगा,
चाहे दहेज़ के नाम, सजा या रूप की.
