Wednesday, March 23, 2011

बचपन ?

पैरों पर 
चलना सीखते ही
बढ़ गये पैर,
माँगने को भीख
या बेचने को   
गुलाब के फूल
और गज़रा 
प्रेमियों को
चौराहे पर,
बरतन साफ़ करने 
और चाय देने
बस्ती के ढाबे पर,
गलत पाना देने पर
उस्ताद जी से
थप्पड़ खाने को 
ऑटो मैकेनिक की
दुकान पर.

हसरत भरी नज़रों से
देखते हैं,
स्कूल जाते,
पार्क में खेलते
हंसते हुए बच्चों को,
और झटक कर सर
फिर लग जाते हैं
अपने धन्धे पर.

गोदी से उतरते ही,
भूल कर
बीच के अंतराल को,
फँस जाते हैं
रोटी कपड़े के जाल में,
शायद झुग्गियों में
बचपन नहीं होता. 

61 comments:

  1. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.

    बिलकुल सच कह रही है आपकी रचना... मार्मिक अभिव्यक्ति.....

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  2. शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.

    एक सच को बयां करती यह पंक्तियां ...।

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  3. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.
    marmik abhivyakti

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  4. बचपन तो ममता के आश्रय में मिलता है, अस्तित्व के युद्धों में बचपन परिपक्व हो जाता है।

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  5. बहुत ही सही बात लिखी है आपने आपने इस पोस्ट में ! दिल से अच्छा लगा !हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर जरुर आना !
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    Shayari Dil Se
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  6. यही सत्य है हमारा, जहां हम सिर्फ खुद के लिए जीते हैं. सत्यपरक रचना के लिए आपका आभार.

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  7. सच कह रही है रचना... आपका आभार.

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  8. एक सच को बयां करती पंक्तियां ...।

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  9. मार्मिक भावपूर्ण दिल को छूती रचना

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  10. beshak ek marmik kavita hai yah. badhai sarthak lekhan ke liye.

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  11. शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.
    मार्मिक भावपूर्ण दिल को छूती रचना निशब्द कर गयी....

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  12. हसरत भरी नज़रों से
    देखते हैं,
    स्कूल जाते,
    पार्क में खेलते
    हंसते हुए बच्चों को,
    और झटक कर सर
    फिर लग जाते हैं
    अपने धन्धे पर.
    Kaisi dard bharee sachhayee aapne bayaan kar daalee!Aise seedhe magar tez shabd,jaise deewaar me keel thonk dee ho!

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  13. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (24-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  14. यही सत्य है हमारे विकसित भारत देश का।
    खाने को दो शाम की रोटी नही
    और हम दुनिया फतह करने निकले है।

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  15. Dil se likhi gayi kavita aur seedhi dil mein hi utarti jaati hai...bahut badia...shubhkaamnaayein..

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  16. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता. ...

    यथार्थ का सुन्दर वैचारिक प्रतुतिकरण...

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  17. भावपूर्ण रचना.

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  18. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.

    In gareeb bacchon ki dasha ka sateek aur marmik chitran kiya hai aapne.....

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  19. सच है ये विडम्बना . बचपन झुग्गियों में पाया ही नहीं जाता .

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  20. बहुत बढ़िया यथार्थ चित्रण.
    काश हम अपने बच्चों के अलावा किसी अन्य बच्चे का जीवन संवार सकें.
    मुश्किल नहीं है.
    आपको वैचारोतेजक कविता के लिए बधाई.

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  21. "शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता. "

    एक कडवे सच को बड़ी सहजता से उभार दिया कैलाश सर.. इस यथार्थवादी चित्रण के लिए धन्यवाद..

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  22. जीवन की एक कड़वी हकीकत को बयां करती सार्थक रचना ! न जाने कितने बचपन गरीबी की भेंट चढ़ जाते हैं, इसका कोई हिसाब नहीं...

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  23. भावपूर्ण रचना.

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  24. शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता
    sirf mazboori aur ummeed hoti hai.

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  25. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.
    bchpan ki yahi durdasha man ko takleef deti hai sundar bahut likha hai aur sach bhi ,marmik rachna .

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  26. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.

    सार्थक और अर्थपूर्ण भाव....

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  27. १४ वर्ष के नीचे के बच्चों से काम नहीं लेना चाहिए । वो तो गरीब हैं , मजदूर हैं और मजबूर भी । लेकिन काम लेने वाले तो थोड़ी सी संवेदनशीलता दिखा सकते हैं ।

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  28. Sir,
    We think alike . This picture of society is very cruel n one can realize only when one put his/her feet in their shoes. We need to be empathetic towards unprivilaged children. Ur poetry touched my soul sir n I believe revolution is the need of hour n pen is our weapon.

    Regards

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  29. aadarniy sir
    bahut hi sateek aur man ko bythit karne wali samvedan sheel prastuti.
    vilamb se tippni derahi hun xhma kijiyaga.
    sadar dhanyvaad
    poonam

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  30. बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना ... आपने सही लिखा है ... इधर हम ओलिम्पिक खेल अपने देश में रखने की बातें करते हैं और दूसरी तरफ हमारे देश में गरीबी में जीने वालों की ये हालत है ...

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  31. bahut sahi.....
    sunder rachna hai ....

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  32. शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.

    सोचने पर मजबूर करती कविता.

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  33. एक सत्य परक रचना |बहुत सुंदर विस्तार और शब्द चयन |
    बधाई
    आशा

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  34. बालश्रम एक अभिशाप है हमारे लिए...शर्मनाक ! शुभकामनायें भाई जी !

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  35. मार्मिक भावपूर्ण दिल को छूती रचना| धन्यवाद|

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  36. सर बहुत ही उम्दा कविता आपको बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं |

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  37. Aah! bada hi marmik chitran.... dukhad baat yah ki ham chahkar v bachapan de nahi pate . sundar rachana.

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  38. जब भी ऐसे किसी बच्चे को देखूंगी तो आपकी यही पंक्तियाँ याद आएंगीं...
    कितनी सटीक और कडवी सच्चाई है... भावुक कर देने वाली पंक्तियाँ...

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  39. बालश्रम की त्रासदी पर आपकी रचना वाकई काबिलेतारीफ है।
    शुभकामनाएं आपको।

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  40. झुग्गियों में केवल पेट होता है या होती है शराब की बोतल।

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  41. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता।

    मार्मिक अभिव्यक्ति।
    शायद झुग्गियों में बचपन नहीं होता- इन शब्दों ने द्रवित कर दिया।

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  42. बहुत मार्मिक चित्रण.
    हम तो बेकार मजबूरी का रोना रोते हैं.
    कोई इनकी मजबूरी देखे

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  43. आज के युग की तल्ख़ सच्चाई को बेहद ख़ूबसूरती से उतारा है आपने अपने शब्दों में....बधाई

    नीरज

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  44. ये मार्मिक कविता दिल में उतर गयी ।
    आपका आभार । कैलाश जी ।

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  45. गोदी से उतरते ही,
    भूल कर
    बीच के अंतराल को,
    फँस जाते हैं
    रोटी कपड़े के जाल में,
    शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.

    nishchit roope se isme yatharth jhalakta hai lekin samadhaan?????

    maarmik rachna par badhaai....

    bhagwaan kisi ko jawaani achhi na de par bachpan jarur de............

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  46. गहरी अनुभूतियों की भावपूर्ण , यथार्थ की ज़मीन से जुड़ी रचना ..

    'शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता '
    ..........................सार्थक-सच्ची अभिव्यक्ति

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  47. बहुत खूब ... कितना कड़ुवा सच है .... सच में वहाँ बचपन आने से पहले ही मर जाता है ....

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  48. मेरी लड़ाई Corruption के खिलाफ है आपके साथ के बिना अधूरी है आप सभी मेरे ब्लॉग को follow करके और follow कराके मेरी मिम्मत बढ़ाये, और मेरा साथ दे ..

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  49. बहुत सुन्दर ..बहुत तीव्र गहन अनुभूति के साथ पिरोई यह कविता ..झोपडी के बच्चों का दर्द है... बहुत सुन्दर ..
    कल आपकी यह पोस्ट चर्चामंच पर होगी... आप वह आ कर अपने विचारों से अनुग्रहित करियेगा ... सादर
    चर्चामंच
    मेरे ब्लॉग में भी आपका स्वागत है - अमृतरस ब्लॉग

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  50. एक कटु सत्य बेहद प्रभावी अंदाज़ में लिखा है ,नि:शब्द हूं .....

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  51. शायद झुग्गियों में
    बचपन नहीं होता.

    मर्मस्पर्शी रचना

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  52. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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  53. education and population control are the only solutions...

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  54. आदरणीय कैलाश सी शर्माजी,
    बिल्‍कुल सही कहा आपने और बेहतरीन रचना

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  55. नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ| धन्यवाद|

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