Tuesday, January 27, 2015

मुझको दूर बहुत है चलना

थके क़दम कब तक चल पायें, 
मंज़िल नज़र नहीं आती है,
जीवन का उद्देश्य नहीं बस
केवल मील के पत्थर गिनना।

सफ़र हुआ था शुरू ज़हाँ से
कितने साथ मिले राहों में,
कभी काफ़िला साथ साथ था
अब बस सूनापन राहों में।
कैसे जीवन से हार मान लूँ,   
मुझको दूर बहुत है चलना।

बना सीढियां सदा सभी को,
पर मैं खड़ा उसी सीढ़ी पर।
मुड़ कर नहीं किसी ने देखा,
जो पहुंचा ऊपर सीढ़ी पर।
सूरज ढला मगर मैं क्यों ठहरूँ,
मुझे चाँद के साथ है चलना।

जो कुछ बीत गया जीवन में,
उस पर अश्रु बहा क्या होगा।
क्यों अंधियारे से हो समझौता,
जब प्रभात निश्चय ही होगा।
नहीं काफ़िला, मगर रुकूं क्यों,   
सूनापन लगता जब अपना।

...कैलाश शर्मा 

28 comments:

  1. जो कुछ बीत गया जीवन में,
    उस पर अश्रु बहा क्या होगा।
    क्यों अंधियारे से हो समझौता,
    जब प्रभात निश्चय ही होगा।..
    यही है आशा और उम्मीद की किरण जो प्रेरित करती है सदा चलते रहने की ...
    बहुत ही लाजवाब भावपूर्ण रचना है ...

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  2. Prerak abhivykti.....sashakt bhav liye

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  3. बहुत बढ़िया सर!


    सादर

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  4. बना सीढियां सदा सभी को,
    पर मैं खड़ा उसी सीढ़ी पर।
    मुड़ कर नहीं किसी ने देखा,
    जो पहुंचा ऊपर सीढ़ी पर।
    सूरज ढला मगर मैं क्यों ठहरूँ,
    मुझे चाँद के साथ है चलना।
    ​शानदार प्रेरणादायक शब्द श्री शर्मा जी

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  5. बस चलते जाना. सुंदर भावपूर्ण रचना.

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  6. सफ़र हुआ था शुरू ज़हाँ से
    कितने साथ मिले राहों में,
    कभी काफ़िला साथ साथ था
    अब बस सूनापन राहों में।
    कैसे जीवन से हार मान लूँ,
    मुझको दूर बहुत है चलना।

    सुंदर पंक्तियां
    आभार।

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  7. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (28-01-2015) को गणतंत्र दिवस पर मोदी की छाप, चर्चा मंच 1872 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. जीवन का उद्देश्य नहीं बस
    केवल मील के पत्थर गिनना...खूबसूरत भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  9. जीवन को गहराई से देखने की ललक..

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  10. जो कुछ बीत गया जीवन में,
    उस पर अश्रु बहा क्या होगा।
    क्यों अंधियारे से हो समझौता,
    जब प्रभात निश्चय ही होगा।
    सकारात्मक और सार्थक पंक्तियाँ, आशा और विश्वास से परिपूर्ण रचना

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  11. उदास होने के बाद भी आत्‍मप्रेरणा से अपने लिए सकारात्‍मकता व आशा तलाशना,.....सुन्‍दर तरीके से बताती कविता।

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  12. सूरज ढला मगर मैं क्यों ठहरूँ,
    मुझे चाँद के साथ है चलना।

    चरैवेति-चरैवेति को इस अंदाज़ में पढ़ना सुखद लगा।

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  13. उम्दा....बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो
    मुकेश की याद में@चन्दन-सा बदन

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  14. जो कुछ बीत गया जीवन में,
    उस पर अश्रु बहा क्या होगा।
    क्यों अंधियारे से हो समझौता,
    जब प्रभात निश्चय ही होगा।
    नहीं काफ़िला, मगर रुकूं क्यों,
    सूनापन लगता जब अपना।

    आस और विश्वास जगाती रचना । आपको बधाई।

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  15. काफ़िला कहाँ साथ ,जीवन की धूप-छाँही राह अकेले दम पार करनी है - सुन्दर कविता !

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  16. सकारात्मक भावना से भरी प्रेरणादायक रचना … मंगलकामनाएं

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  17. वाह आशावाद का रंग लिये .....

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  18. आशा का संचार करती हुई सुन्दर कविता।

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  19. आज 31/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  20. जो कुछ बीत गया जीवन में,
    उस पर अश्रु बहा क्या होगा।
    क्यों अंधियारे से हो समझौता,
    जब प्रभात निश्चय ही होगा।
    बिलकुल सटीक अभिव्यक्ति
    नेता और भ्रष्टाचार!

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  21. जीवन का सत्य बयां करती....प्रेरणादायक..सार्थक रचना!

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  22. आशा के वितान - तले सकारात्मक - सोच । सुन्दर हैं मन के उद्गार ।

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  23. सुन्दर प्रस्तुति

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  24. नहीं काफ़िला, मगर रुकूं क्यों,
    सूनापन लगता जब अपना।

    ...............विश्वास जगाती रचना ।

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  25. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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