Tuesday, March 27, 2012

नयी पगडंडी

हजारों क़दमों के चलने से
बनी पगडंडी 
नहीं पहुंचाती 
किसी नयी मंज़िल पर.


छोड़ देना नौका को
लहरों के सहारे
दे सकता है कुछ पल को
अनिश्चितता जनित संतोष,
पर पाने को साहिल
उठाना होता है चप्पू
अपने ही हाथों में.


चलना होता है
कंटक भरी पथरीली राह पर
नयी मंज़िल की खोज़ में
और बन जाती है 
एक नयी पगडंडी 
पीछे चलते लोगों से.


कैलाश शर्मा

52 comments:

  1. vaah ..bina prayatn ke koi manjil nahi milti bahut achcha sandesh de rahi hai aapki kavita.

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  2. सत्य कहा सर.... प्रेरक रचना...
    सादर।

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  3. वाह.....
    yes...
    don't just follow,
    be a leader....

    regards.

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....प्रेरक रचना..

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  5. चलना होता है
    कंटक भरी पथरीली राह पर
    नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से.
    सार्थक दृष्टिकोण को दर्शाती शानदार रचना।

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  6. प्रेरक प्रस्तुति...इस तरह आगे बढ़ने की कि लोग अनुसरण करें!

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  7. चलना होता है
    कंटक भरी पथरीली राह पर
    नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से.

    बेहतरीन और शानदार है पोस्ट।

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  8. पाने को साहिल
    उठाना होता है चप्पू
    अपने ही हाथों में.
    अक्षरश: सही कहा है आपने ...बहुत ही बढिया।

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  9. और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से.

    बस चलना होता है, मिल जाती है नई राह, नई मंजिल... प्रेरक रचना... आभार...

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  10. बहुत सुंदर रचना

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  11. अरवीला रविकर धरे, चर्चक रूप अनूप |
    प्यार और दुत्कार से, निखरे नया स्वरूप ||

    आपकी टिप्पणियों का स्वागत है ||

    बुधवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.com

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  12. चलना होता है
    कंटक भरी पथरीली राह पर
    नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से.
    बेहतरीन !

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  13. पाने को साहिल
    उठाना होता है चप्पू
    अपने ही हाथों में... मंजिल इन्हीं हौसलों को मिलती है

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  14. छोड़ देना नौका को
    लहरों के सहारे
    दे सकता है कुछ पल को
    अनिश्चितता जनित संतोष,
    पर पाने को साहिल
    उठाना होता है चप्पू
    अपने ही हाथों में.
    Kya baat kahee hai!

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  15. नई राह बनाने में थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है

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  16. वाह ... बहुत खूब ... खुद चलना पढता है पहले फिर कारवाँ बढ़ता जाता है ... राह बनती जाती है ...

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  17. बहुत सुंदर रचना.....

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  18. बेहद उम्दा. शानदार.

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  19. पर पाने को साहिल
    उठाना होता है चप्पू
    अपने ही हाथों में.bilkul shi kha aapne kailash jee kavita ke madhayam se.

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  20. बस किसी के शुरुआत करने की देरी होती है ... काफिला अपने आप बनता जाता है ... प्रेरक रचना ... आभार ...

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  21. बहुत सुंदर पंक्तियाँ

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  22. चलना होता है
    कंटक भरी पथरीली राह पर
    नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से.

    बहुत सुन्दर

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  23. बेहतरीन सृजन , अपने सन्देश में सफल .....बधाईयाँ जी

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  24. पर पाने को साहिल
    उठाना होता है चप्पू
    अपने ही हाथों में
    बहुत सुन्दर

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  25. प्रेरक, बहुत सुन्दर!

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  26. अगर दिल में है उमंग
    तो रस्ते चलेंगे संग !!

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  27. बेहद प्रेरक रचना..

    "चलना होता है
    कंटक भरी पथरीली राह पर
    नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से."
    वाह.. बहुत खूब लिखा है.. :)

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  28. पूरा जीवन भाग्य के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता हैं, थोड़ा सुस्ता लेना तो बनता है।

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  29. नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से...waah bahut khoob badhai


    kabhi -kabhi hamare blog par bhi aayen swagat hai aapka nayi post par

    http://sapne-shashi.blogspot.com

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  30. sarthak abhivyakti ...!
    shubhkamnayen ...!!

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  31. कैलाश जी , शानदार कविता....

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  32. पगडण्डी के मार्गदर्शन के लिए शुक्रिया ....

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  33. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29-03 -2012 को यहाँ भी है

    .... नयी पुरानी हलचल में ........सब नया नया है

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  34. पर पाने को साहिल
    उठाना होता है चप्पू
    अपने ही हाथों में... khud ki himmat se hi hoti hai raahein asaan...
    Sundar abhivyakti
    Saadar

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  35. शानदार प्रेरक प्रस्तुति.
    मंजिल को ध्यान में रख,उस तरफ चलने का प्रयास करना ही सार्थक है.

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  36. sundar rachna.
    mere blog par bhi aaiyega

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  37. चलना होता है
    कंटक भरी पथरीली राह पर
    नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से.
    .......इस उत्कृष्ट रचना के लिए ... बधाई स्वीकारें.

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  38. just Best !!
    नयी मंज़िल की खोज़ में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी...

    Loved these lines... hopeful
    :)

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  39. बेहतरीन रचना ,,,जीवन में आगे बढ़ने को प्रेरित करती हुई ....

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  40. चलना होता है
    कंटक भरी पथरीली राह पर
    नयी मंज़िल की खोज में
    और बन जाती है
    एक नयी पगडंडी
    पीछे चलते लोगों से.

    जीवन का एक सत्य उतर आया है इन पंक्तियों में।

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  41. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति. जीवन की सत्यता को स्वीकारती. बधाई.

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  42. सच कहा आपने ...लकीर से हटकर चलने वाले ही अपने निशाँ छोड़ जाते हैं .....!

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  43. सत्य... कि नदी की धार के साथ बहनेवाला कुछ अलग नहीं कर सकता, वह भेडचाल ही चल सकता है जिंदगीभर...
    पर recentely मुझे किसी ने हितायद दी कि कभी-कभी, थोड़ी देर के लिए ही सही उस धार के साथ बहना चाहिए, शान्ति मिलती है...

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  44. sach kaha...safalta ke liye nayi pagdandi banani hi padti hai

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