Thursday, November 13, 2014

शब्द

तैर रहे थे शब्द हवाओं में
प्रतीक्षा में संवरने को पंक्ति में,
भरा था लबालब अंतस भावों से
पाने को एक अभिव्यक्ति शब्दों में,
टिकी हुईं थी दो आँखें चहरे पर
इंतज़ार में सुनने को वो शब्द,
नहीं पकड़ पाये वे शब्द
नहीं गूंथ पाये उनको अभिव्यक्ति में
और खो गये मौन के जंगल में।

आज जीवन के सूनेपन में
फ़िर ताकते हैं वे शब्द
शिकायत भरी नज़रों से,
पूछते हैं कारण उस मौन का
नहीं उत्तर जिसका मेरे पास।

आज भी बेचैन हैं वे शब्द
अकेलेपन मैं मेरे मौन की तरह।

....कैलाश शर्मा 

27 comments:

  1. शब्द बहुत दिन मौन नहीं रह पायेंगे
    तीर की तरह लक्ष्य भेदने निकल ही आयेंगे ।

    बहुत सुंदर ।

    ReplyDelete
  2. शब्दों की खूबसूरत माला जिसके भाव अंतर्मन को छूते

    ReplyDelete
  3. Lovely poetry and beautiful way of expressing..:)

    ReplyDelete
  4. उन बेचैन शब्दों को मौन की कैद से आज़ाद कर दीजिए और उड़ जाने दीजिये भावना के आकाश में अभिव्यक्ति की तहरीरें हवाओं पर लिखने के लिये ! बहुत सुन्दर रचना !

    ReplyDelete
  5. वाह , हृदयस्पर्शी भाव

    ReplyDelete
  6. उन तैरते शब्दों को किसी ने तो करीने से लगाया होगा !

    मौन के जंगल चले जाने से पहले किसी ने तो सीने से लगा वाक़या बनाया होगा !

    उन बेचैन शब्दों को कभी किसी के अधरों से निकलते आपने क्या देखा नहीं ?

    ReplyDelete
  7. जो मौन ही रह जाते हैं वे शब्द बार-बार उमडते हैं .लेकिन फिर घुमड़ कर रह जाना ही उनकी नियति बन जाती है..

    ReplyDelete
  8. आज जीवन के सूनेपन में
    फ़िर ताकते हैं वे शब्द
    शिकायत भरी नज़रों से,
    पूछते हैं कारण उस मौन का
    नहीं उत्तर जिसका मेरे पास।
    ​बहुत से शब्दों का , सवालों का कोई जवाब नहीं होता ! बहुत ही सार्थक और सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीय शर्मा जी

    ReplyDelete
  9. सुन्‍दर, गहरे भावों से सजी कविता।

    ReplyDelete
  10. अति भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

    ReplyDelete
  11. कल 15/नवंबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    ReplyDelete
  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (15-11-2014) को "मासूम किलकारी" {चर्चा - 1798} पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    बालदिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  13. वाकई बहुत मुश्किल होता है उन शब्दों को तलाशना.

    ReplyDelete
  14. बहुत गहरी रचना ..... सार्थक अभिव्यक्ति ...

    ReplyDelete
  15. बहुत सुंदर प्रेरक पंक्तियाँ, शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  16. सुंदर शब्द, भावपूर्ण अभिव्यक्ति....


    ReplyDelete
  17. हृदय स्पर्शी रचना कैलाश जी :)

    ReplyDelete
  18. जीवन में ऐसे कितने ही शब्द छूट जाते हैं जो किसी न किसी पल सामने खड़े हो जाते हैं जवाब मांगते ...
    अर्थपूर्ण रचना है ...

    ReplyDelete
  19. बेहद भावपूर्ण... बधाई.

    ReplyDelete
  20. भावमय करते शब्‍दों का संगम ....

    ReplyDelete
  21. मर्मस्पर्शी रचना ...

    ReplyDelete