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Saturday, July 06, 2019
मेरी जीवन अभिलाषा हो
लेबल:
Kasish - My Poetry,
अभिलाषा,
कैलाश शर्मा,
जीवन,
जुगनू,
भाषा,
मंजूषा,
शब्द,
संबल
Thursday, February 14, 2019
क्षणिकाएं
जब
भी पीछे मुड़कर देखा
कम हो गयी गति कदमों की,
जितना गंवाया समय
बार बार पीछे देखने में
मंज़िल हो गयी उतनी ही दूर
व्यर्थ की आशा में।
कम हो गयी गति कदमों की,
जितना गंवाया समय
बार बार पीछे देखने में
मंज़िल हो गयी उतनी ही दूर
व्यर्थ की आशा में।
****
बदल जाते हैं शब्दों के अर्थ
व्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,
लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थ
अगर समझ पाओ तो।
****
व्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,
लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थ
अगर समझ पाओ तो।
****
झुलसते अल्फाज़,
कसमसाते अहसास
होने को अभिव्यक्त,
पूछती हर साँस
सबब वापिस आने का,
केवल एक तुम्हारे न होने से।
कसमसाते अहसास
होने को अभिव्यक्त,
पूछती हर साँस
सबब वापिस आने का,
केवल एक तुम्हारे न होने से।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अल्फाज़,
अहसास,
कैलाश शर्मा,
मंजिल,
मौन,
शब्द,
साँस
Wednesday, May 02, 2018
अनकहे शब्द
लेबल:
Kailash Sharma,
Kashish-My Poetry,
अंधड़,
ज़िंदगी,
भावनाएं,
मंजिल,
शब्द
Thursday, August 27, 2015
शब्दों का मौन
अंतस का कोलाहल
रहा अव्यक्त शब्दों में,
कुनमुनाते रहे शब्द
उफ़नते रहे भाव
उबलता रहा आक्रोश
उठाने को ढक्कन
शब्दों के मौन का।
रहा अव्यक्त शब्दों में,
कुनमुनाते रहे शब्द
उफ़नते रहे भाव
उबलता रहा आक्रोश
उठाने को ढक्कन
शब्दों के मौन का।
बहुत आसान है
फेंक देना शब्दों को
दूसरों पर आक्रोश में,
हो जाते शब्द
शांत कुछ पल को
हो जाती संतुष्टि अभिव्यक्ति की।
फेंक देना शब्दों को
दूसरों पर आक्रोश में,
हो जाते शब्द
शांत कुछ पल को
हो जाती संतुष्टि अभिव्यक्ति की।
होने पर शांत तूफ़ान
डूबने उतराने लगते शब्द
पश्चाताप के दलदल में,
हो जाता और भी कठिन
निकलना इस दलदल से।
डूबने उतराने लगते शब्द
पश्चाताप के दलदल में,
हो जाता और भी कठिन
निकलना इस दलदल से।
कब होता है शाश्वत
अस्तित्व तूफ़ान का,
बेहतर है सहलाना शब्दों को
बहलाना रहने को मौन
तूफ़ान के गुज़र जाने तक।
अस्तित्व तूफ़ान का,
बेहतर है सहलाना शब्दों को
बहलाना रहने को मौन
तूफ़ान के गुज़र जाने तक।
....©कैलाश शर्मा
Thursday, November 13, 2014
शब्द
तैर रहे थे शब्द हवाओं में
प्रतीक्षा में संवरने को पंक्ति में,
भरा था लबालब अंतस भावों से
पाने को एक अभिव्यक्ति शब्दों में,
टिकी हुईं थी दो आँखें चहरे पर
इंतज़ार में सुनने को वो शब्द,
नहीं पकड़ पाये वे शब्द
नहीं गूंथ पाये उनको अभिव्यक्ति में
और खो गये मौन के जंगल में।
प्रतीक्षा में संवरने को पंक्ति में,
भरा था लबालब अंतस भावों से
पाने को एक अभिव्यक्ति शब्दों में,
टिकी हुईं थी दो आँखें चहरे पर
इंतज़ार में सुनने को वो शब्द,
नहीं पकड़ पाये वे शब्द
नहीं गूंथ पाये उनको अभिव्यक्ति में
और खो गये मौन के जंगल में।
आज जीवन के सूनेपन में
फ़िर ताकते हैं वे शब्द
शिकायत भरी नज़रों से,
पूछते हैं कारण उस मौन का
नहीं उत्तर जिसका मेरे पास।
फ़िर ताकते हैं वे शब्द
शिकायत भरी नज़रों से,
पूछते हैं कारण उस मौन का
नहीं उत्तर जिसका मेरे पास।
आज भी बेचैन हैं वे शब्द
अकेलेपन मैं मेरे मौन की तरह।
अकेलेपन मैं मेरे मौन की तरह।
....कैलाश शर्मा
लेबल:
अभिव्यक्ति,
बेचैन,
भाव,
मौन,
शब्द,
शिकायत,
सर्वाधिकार सुरक्षित
Friday, February 07, 2014
सूनापन
गुम हो गये हैं शब्द
जीवन के कोलाहल में,
बैठे हैं मौन
तकते एक दूजे को,
कहने को बहुत कुछ
एक दूसरे की नज़रों में
पर नहीं चाहते तोड़ना
मौन अहसासों का,
छुपाते एक दूसरे से
जीवन के कोलाहल में,
बैठे हैं मौन
तकते एक दूजे को,
कहने को बहुत कुछ
एक दूसरे की नज़रों में
पर नहीं चाहते तोड़ना
मौन अहसासों का,
छुपाते एक दूसरे से
दर्द अंतस का,
अश्क़ आँखों के,
भय अकेलेपन के भविष्य का।
अश्क़ आँखों के,
भय अकेलेपन के भविष्य का।
अहसास होने या न होने का
हो जाता और भी गहन
एक दूजे के मन में
जीवन के सूनेपन में।
हो जाता और भी गहन
एक दूजे के मन में
जीवन के सूनेपन में।
....कैलाश शर्मा
Friday, March 15, 2013
शब्दों की पोटली
(चित्र गूगल से साभार)
शब्द थे
खो जाते
भाव के
बवंडर में
और रह
जाता खड़ा
बन के मौन
पुतला
तुम्हारे
सामने.
सोचा बाँध
कर रख दूं
एक पोटली
में
उन शब्दों को
जो कह
न पाया,
और सौंप
दूँ तुम्हें
तुम्हारे आने
पर.
तुम्हारी मंज़िल की राह
नहीं जाती अब इस गली से,
नहीं जाती अब इस गली से,
आज भी खड़ा
हूँ
प्रतीक्षा में दरवाज़े पर
लेकर
शब्दों की पोटली
जो
कुलबुला रहे हैं
बाहर आने
को.
कैलाश शर्मा
लेबल:
कविता,
पोटली,
शब्द,
सर्वाधिकार सुरक्षित
Monday, July 23, 2012
शब्द क्यों गुम हो गये
छा गयी मन में उदासी,
भाव क्यों मृत हो गये.
लेखनी भी थक गयी है,
शब्द क्यों गुम हो गये.
अश्क कोरों पर थमे हैं,
नयन देते न विदाई.
नेह चुकता जा रहा पर
आस की लौ बुझ न पायी.
देहरी थक कर खड़ी है,
पर कदम गुम हो गये.
चांदनी सी शुभ्र चादर
एक सलवट को तरसती.
मिलन का वादा नहीं था
आँख पर पथ से न हटती.
मौन हो पाया मुखर न,
पर बयन क्यों खो गये.
मोड़ हमने खुद चुना था
राह सीधी छोड़ कर.
आज पीछे झांकते जब
कोई आता न नज़र.
दोष न प्रारब्ध का था,
हम ही खुद में खो गये.
कैलाश शर्मा
भाव क्यों मृत हो गये.
लेखनी भी थक गयी है,
शब्द क्यों गुम हो गये.
अश्क कोरों पर थमे हैं,
नयन देते न विदाई.
नेह चुकता जा रहा पर
आस की लौ बुझ न पायी.
देहरी थक कर खड़ी है,
पर कदम गुम हो गये.
चांदनी सी शुभ्र चादर
एक सलवट को तरसती.
मिलन का वादा नहीं था
आँख पर पथ से न हटती.
मौन हो पाया मुखर न,
पर बयन क्यों खो गये.
मोड़ हमने खुद चुना था
राह सीधी छोड़ कर.
आज पीछे झांकते जब
कोई आता न नज़र.
दोष न प्रारब्ध का था,
हम ही खुद में खो गये.
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