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Wednesday, December 12, 2018

क्षणिकाएं


जियो हर पल को
एक पल की तरह
सम्पूर्ण अपने आप में,
न जुड़ा है कल से
न जुड़ेगा कल से।
***

काश होता जीवन
कैक्टस पौधे जैसा,
अप्रभावित
धूप पानी स्नेह से,
खिलता जिसका फूल
तप्त मरुथल में
दूर स्वार्थी नज़रों से|
***

दुहराता है इतिहास
केवल उनके लिए
जो रखते नज़र इतिहास पर।

जो चलते हैं साथ
पकड़ उंगली वर्त्तमान की,
उनका हर क़दम
बन जाता स्वयं इतिहास
अगली पीढी का।
***

धुंधलाती शाम
सिसकती हवा
टिमटिमाते कुछ स्वप्न
कसमसाते शब्द
सबूत हैं मेरे वज़ूद का।
***

...©कैलाश शर्मा

Saturday, November 24, 2012

कैक्टस के फूल

नहीं सोचा था कभी 
आँगन की हरी भरी बगिया में 
छा जायेगा मरुथल 
और उग आयेंगे कैक्टस। 

बगिया की सोच 
शायद होगी सही, 
नहीं रही होगी आशा 
पानी देने और 
देखभाल करने की
इन कमजोर 
और कांपते हाथों से,
और सौंप दिया आँगन 
मरुथल के हाथों में 
जहां उगते सिर्फ कैक्टस 
जिन्हें नहीं ज़रूरत 
किसी देखभाल की। 

आज देखा आँगन में 
कैक्टस पर खिला 
एक सुंदर फूल, 
छूने को बढ़ी उंगलियों में 
चुभ गया 
कैक्टस का काँटा 
पर नहीं हुआ दर्द,
आदत हो गयी थी 
उंगलियों को
काँटों से बिंधने की 
गुलाबों को छूने पर।

कैलाश शर्मा