Showing posts with label अधर. Show all posts
Showing posts with label अधर. Show all posts

Wednesday, January 22, 2014

क्यों अधर न जाने रूठ गये

बहुत बहाये हैं आंसू इन नयनों ने,
अब तो बाक़ी कुछ तर्पण को रहने दो.

क्यों बेमानी हो गये शब्द,
भावों के सोते सूख गये.
कहने को कितनी बातें थीं,
क्यों अधर न जाने रूठ गये.

बहुत भटकता रहा ख्वाब के ज़ंगल में,
कुछ देर हकीक़त के दामन में रहने दो.

क्यों परसा मौन है जीवन में,
क्यों स्वप्न हो गए रंग हीन.
आशा की लहर जो आयी थी,
क्यों हुई किनारे पर विलीन.

अब नहीं चाहता कोई कांधा रोने को,
अपने जीवन की लाश स्वयं ही ढ़ोने दो.

चाहत के बीज क्यों बोये थे,
क्यों फल पाने की इच्छा की.
कुछ समय दिया होता ख़ुद को
मन होता आज न एकाकी.

देख लिए हैं बहुत रूप तेरे जीवन,
अब चिरनिद्रा में मुझे शांति से सोने दो.


....कैलाश शर्मा