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Saturday, August 02, 2014

आवाज़ मौन की

जीवन के अकेलेपन में     
और भी गहन हो जाती
संवेदनशीलता,
होता कभी अहसास
घर के सूनेपन में
किसी के साथ होने का,
शायद होता हो अस्तित्व
सूनेपन का भी.
     ***
शायद हुई आहट           
दस्तक सुनी दरवाज़े पर
पर नहीं था कोई,
गुज़र गयी हवा
रुक कर कुछ पल दर पर,
सुनसान पलों में हो जाते
कान भी कितने तेज़
सुनने लगते आवाज़
हर गुज़रते मौन की.
      ***
आंधियां और तूफ़ान       
आये कई बार आँगन में
पर नहीं ले जा पाये
उड़ाकर अपने साथ,
आज भी बिखरे हैं
आँगन में पीले पात
बीते पल की यादों के
तुम्हारे साथ.


...कैलाश शर्मा 

Friday, March 07, 2014

अनुत्तरित प्रश्न

मुझसे उत्तर मत मांगो बेटी,
यह प्रश्न अनुत्तरित रहने दो.

आकर सपने में तुम बेटी,               
एक प्रश्न रोज़ करती माँ से.
क्यों मौन रहीं तुम माँ होकर,
जब रोका जग में आने से?

मैं कैसे तुमको समझाऊँ बेटी,
उस पल थी क्यों मौन रही?
रोम रोम तड़पा था तब मेरा,
जब तुझको आने दिया नहीं.

मैं नहीं चाहती थी मेरी बेटी
आफ़रीन बन दुनिया में आये.
परिवार की बेटे की चाहत में,
तुझको न कहीं दुत्कारा जाये.

कैसे तुम को बतलाऊँ मैं बेटी?
न समझोगी दर्द विवशता का.
कितने स्वप्न बुने मेरे मन ने
हर ताना बुनते तेरे स्वेटर का.

पर अब न ऐसा फिर होने दूंगी,
मेरी गोदी में तुझको आना होगा.
चाहे दुनिया हो जाये एक तरफ़,
तुझको फ़िर घर में लाना होगा.

अब मुझको न समझो अशक्त,
सह लिया दर्द अबला बन कर.
अब कमज़ोर न होंगे हाथ मेरे,
कर सकती रक्षा दुर्गा बन कर.

तुम्हें सिखाऊँगी जग से लड़ना,
तुमको अशक्त न मैं बनने दूँगी.
जाग गयी मेरे अन्दर की नारी,
जन्म पूर्व तुझको न मरने दूँगी.


...कैलाश शर्मा 

Wednesday, January 22, 2014

क्यों अधर न जाने रूठ गये

बहुत बहाये हैं आंसू इन नयनों ने,
अब तो बाक़ी कुछ तर्पण को रहने दो.

क्यों बेमानी हो गये शब्द,
भावों के सोते सूख गये.
कहने को कितनी बातें थीं,
क्यों अधर न जाने रूठ गये.

बहुत भटकता रहा ख्वाब के ज़ंगल में,
कुछ देर हकीक़त के दामन में रहने दो.

क्यों परसा मौन है जीवन में,
क्यों स्वप्न हो गए रंग हीन.
आशा की लहर जो आयी थी,
क्यों हुई किनारे पर विलीन.

अब नहीं चाहता कोई कांधा रोने को,
अपने जीवन की लाश स्वयं ही ढ़ोने दो.

चाहत के बीज क्यों बोये थे,
क्यों फल पाने की इच्छा की.
कुछ समय दिया होता ख़ुद को
मन होता आज न एकाकी.

देख लिए हैं बहुत रूप तेरे जीवन,
अब चिरनिद्रा में मुझे शांति से सोने दो.


....कैलाश शर्मा 

Thursday, June 13, 2013

कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहने दें

सारा जीवन गंवा दिया है
प्रश्नों के उत्तर देने में,
बैठें भूल सभी बंधन को,
कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहने दें.

सूरज पाने की चाहत में,
शीतलता शशि की बिसरायी,
टूटे तारों से अब क्या मांगें,
अब आस यहीं पर थमने दें.

रिश्ते बने कभी ज़ंजीरें,
यादें बनीं कभी अंगारे,
बंद करें मुट्ठी में कुछ पल,
कल को कल पर ही रहने दें.

तप्त धूप में चलते चलते
सूख गयी जीवन की सरिता,
क्यों ढूंढें छाया तरुवर की
अपनी छाया ही साथी बनने दें.

धोखा खाया जब अपनों से
शिकवा गैरों से क्यों कर हो,
ढूंढें खुशियाँ अपने अन्दर,
जीवन अब निर्झर बहने दें. 


.....कैलाश शर्मा 

Tuesday, April 09, 2013

रोमांच अनिश्चितता का


रमी का खेल
रोके रखते कुछ पत्ते
इंतजार में आने के
बीच या साथी पत्ते के,
नहीं आता वह
और फेंक देते
हाथ के पत्ते को.

लेकिन अगला पत्ता
होता वही
जिसकी थी ज़रुरत
हाथ का पत्ता
फेंकने से पहले.
होता है अफ़सोस
कुछ पल को,
लेकिन आ जाती मुस्कान
कुछ पल बाद
इच्छित पत्ता आने पर.

यह अनिश्चितता ही
बनाये रखती रोमांच
और उत्साह
खेल और जीवन के
हर अगले पल का.

...कैलाश शर्मा

Monday, March 25, 2013

अब होली में रंग नहीं है


नहीं फाग के स्वर आते हैं,
ढोलक ढप हैं मौन हो गए,
अब उत्साह नहीं है मन में
अब होली में रंग नहीं है.

न मिठास बाक़ी रिश्तों में,
मिलते हैं गले अज़नबी जैसे,
रंग गुलाल हैं पहले ही जैसे
प्रेम पगे पर रंग नहीं हैं.

महंगाई सुरसा सी बढ़ती,
है गरीब की थाली खाली,
कैसे ख़ुमार छाये होली का
जब गिलास में भंग नहीं है.

गुझिया का खोया मिलावटी,
मुस्कानें बनावटी लगतीं,
आगे बढ़ते हाथ हैं मिलते,
दिल में पर उमंग नहीं है.

शहरों की सडकों पर टेसू
पैरों तले हैं कुचले जाते,
काले पीले चेहरे के रंग में
भौजी का वह रंग नहीं है.

एक बार लौट सकें पीछे
एक बार वह होली पायें,
ख़्वाब कहाँ हो सकते पूरे
अब वे साथी संग नहीं हैं.

*****होली की हार्दिक शुभकामनायें*****

कैलाश शर्मा

Friday, March 15, 2013

शब्दों की पोटली


                                                         (चित्र गूगल से साभार) 
शब्द थे खो जाते
भाव के बवंडर में
और रह जाता खड़ा
बन के मौन पुतला
तुम्हारे सामने.

सोचा बाँध कर रख दूं
एक पोटली में
उन शब्दों को
जो कह न पाया,
और सौंप दूँ तुम्हें
तुम्हारे आने पर.

तुम्हारी मंज़िल की राह 
नहीं जाती अब इस गली से,
आज भी खड़ा हूँ
प्रतीक्षा में दरवाज़े पर
लेकर शब्दों की पोटली
जो कुलबुला रहे हैं
बाहर आने को.

कैलाश शर्मा 

Tuesday, January 29, 2013

मत बांधो मुझको परिभाषा के बंधन में


मत बांधो मुझको परिभाषा के बंधन में,
मुझको तो बस नारी बन कर जीने दो.

बचपन कब बीता तितली सा,
हर कदम कदम पर पहरा था.
प्रतिपल यह याद दिलाया था,
वह घर मेरा कब अपना था.

सभी उमंगें मन की मन में दबी रहीं,
कह न पायी मुझको मर्ज़ी से जीने दो.

गृहलक्ष्मी का थोथा नाम दिया,
अस्तित्व मगर खूंटी पर टांगा.
बिस्तर और रसोई तक जीवन,
भूली ज़ीवन से मैंने क्या मांगा.

मैंने विस्मृत कर दिया नाम भी अपना था,
अब कुछ पल तो अपने में मुझको जीने दो.

ममता, पति सेवा के बदले,
सीता सावित्री कह बहलाया.
मैं रही सोचती क्यों इनमें,
श्रवण व राम न बन पाया.

निर्दोष अहिल्या ही पत्थर बनने को शापित,
अब हर पत्थर से दुर्गा की मूरत गढ़ने दो.

ममता, प्यार, दया गुण को,
मैं कैसे बिसराऊँ एक साथ.
जब बनते ये शोषण कारण,
अंतस में होता है आर्तनाद.

पीछे चलते चलते कितने युग बीत गये,
अब साथ साथ मुझको भी आगे बढ़ने दो.

रक्तबीज दानव चहुँ ओर खड़े,
शंकर भी मौन समाधि में बैठे.
मुझ को ही बनना होगा दुर्गा,
जब रक्षक ही भक्षक बन बैठे.

अबला बन कर के सहे हैं मैंने ज़न्म कई,
अब सबला बन कर के भी आगे जीने दो.

अस्तित्व उठा कर कन्धों पर,
आगे मुझ को है चलते जाना.
पग में कितने भी घाव मिलें,
उनका ख़ुद मरहम बन जाना. 

अब किसी राह पर पीछे मुड़ कर न देखूँगी,
मेरा भविष्य अब मेरे हाथों में ही रहने दो.

कैलाश शर्मा 

Thursday, January 17, 2013

उनके घरों में शायद न होती हैं बेटियाँ


लेने से ज़न्म पहले ही मरती हैं बेटियाँ,   
सब बोझ भेद भाव का ढ़ोती हैं बेटियाँ.
फ़िरते हैं गुनहगार खुले आम सड़क पर,
उनका गुनाह उम्र भर ढ़ोती हैं बेटियाँ.

सब टोक और बंदिशें सहती हैं बेटियाँ,
वारिस कपूत बेटे भी, पराई हैं बेटियाँ.
हर वक़्त इंतजार करती हैं प्यार का,
रह कर के मौन देती हैं प्यार बेटियाँ.

घर से हों चाहे दूर, पर कब दूर बेटियाँ,
पल भी नयन मुंदें तो दिखती हैं बेटियाँ.
सूना हुआ है आँगन, आती है याद तेरी,
तस्वीर बन के केवल रह जाती बेटियाँ.

माँ बाप की खुशी, जब खुश रहती बेटियाँ,
सहते हैं दर्द कितना, जब रोती हैं बेटियाँ.
इज्ज़त से लड़कियों की खिलवाड़ हैं करते,
उनके घरों में शायद न होती हैं बेटियाँ.

कैलाश शर्मा 

Sunday, November 11, 2012

बहुत कठिन बनना राम


बहुत आसान है
उंगली उठाना,
लेकिन बहुत कठिन  
बनना राम.

क्या महसूस कर सकते हो
उस दर्द को
जो जिया होगा राम ने,
क्या बीती होगी उन पर,
कितना रोया होगा अंतस,
एक धोबी के कहने पर
त्यागने में
उस सीता को
जिसको किया था प्रेम
अपने से ज्यादा
और सहे थे कितने कष्ट
मुक्त करने को 
रावण की क़ैद से.

लेकिन राम नहीं थे
एक स्वेच्छाचारी राजा
जो दबा देते विरोध की आवाज
एक धोबी की.
वह थे एक सच्चे जन नायक
जिनको स्व-हित से सर्वोपर था
जन हित और जन मत,
बहुमत नहीं था संबल
अपनी बात सही सिद्ध करने का
और दबाने को स्वर
अंतिम व्यक्ति का.
दबाया अपना दर्द अंतस में
और त्यागा सीता को
जनमत का मान रखने.

त्याग सकते थे राज्य
देने साथ सीता का,
लेकिन नहीं था स्वीकार 
अपने सुख के लिये 
भागना उत्तरदायित्व 
और क्षत्रिय धर्म से.

हे राम!
तुम्हारी महानता का आंकलन
नहीं संभव,
सोने को नहीं तोला जाता
लोहे की तराज़ू में
पत्थर के बांटों से.

कैलाश शर्मा