जीवन के
अकेलेपन में
और भी गहन
हो जाती
संवेदनशीलता,
होता कभी अहसास
घर के
सूनेपन में
किसी के
साथ होने का,
शायद होता
हो अस्तित्व
सूनेपन का
भी.
***
शायद हुई
आहट
दस्तक
सुनी दरवाज़े पर
पर नहीं
था कोई,
गुज़र गयी
हवा
रुक कर
कुछ पल दर पर,
सुनसान
पलों में हो जाते
कान भी
कितने तेज़
सुनने
लगते आवाज़
हर गुज़रते
मौन की.
***
आंधियां और
तूफ़ान
आये कई
बार आँगन में
पर नहीं
ले जा पाये
उड़ाकर
अपने साथ,
आज भी
बिखरे हैं
आँगन में
पीले पात
बीते पल
की यादों के
तुम्हारे
साथ.
...कैलाश
शर्मा







