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Sunday, November 11, 2012

बहुत कठिन बनना राम


बहुत आसान है
उंगली उठाना,
लेकिन बहुत कठिन  
बनना राम.

क्या महसूस कर सकते हो
उस दर्द को
जो जिया होगा राम ने,
क्या बीती होगी उन पर,
कितना रोया होगा अंतस,
एक धोबी के कहने पर
त्यागने में
उस सीता को
जिसको किया था प्रेम
अपने से ज्यादा
और सहे थे कितने कष्ट
मुक्त करने को 
रावण की क़ैद से.

लेकिन राम नहीं थे
एक स्वेच्छाचारी राजा
जो दबा देते विरोध की आवाज
एक धोबी की.
वह थे एक सच्चे जन नायक
जिनको स्व-हित से सर्वोपर था
जन हित और जन मत,
बहुमत नहीं था संबल
अपनी बात सही सिद्ध करने का
और दबाने को स्वर
अंतिम व्यक्ति का.
दबाया अपना दर्द अंतस में
और त्यागा सीता को
जनमत का मान रखने.

त्याग सकते थे राज्य
देने साथ सीता का,
लेकिन नहीं था स्वीकार 
अपने सुख के लिये 
भागना उत्तरदायित्व 
और क्षत्रिय धर्म से.

हे राम!
तुम्हारी महानता का आंकलन
नहीं संभव,
सोने को नहीं तोला जाता
लोहे की तराज़ू में
पत्थर के बांटों से.

कैलाश शर्मा