अश्क़ जब आँख से ढला
होगा,
दर्द दिल का बयां हुआ होगा।
दर्द दिल का बयां हुआ होगा।
एक तस्वीर उभर आई
थी,
ये पता कब धुंआ धुंआ होगा।
बात लब पर थमी रही
होगी,
नज्र ने कुछ नहीं कहा होगा।
आज तक दंश गढ़ रहा
यह है,
बेवफ़ा समझ के गया होगा।
बेवफ़ा समझ के गया होगा।
चाँद का दर्द कौन
समझा है,
सुब्ह चुपचाप घर गया होगा।
सुब्ह चुपचाप घर गया होगा।
न कुछ हमने कहा न
था तूने,
दास्ताँ कौन गढ़ गया होगा।
दास्ताँ कौन गढ़ गया होगा।
बारहा बात सिर्फ़
इतनी थी,
बात कहने न कुछ बचा होगा।
~©कैलाश शर्मा
