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Friday, May 03, 2019

क्षणिकाएं


गीला कर गया
आँगन फिर से,
सह न पाया
बोझ अश्क़ों का,
बरस गया।
****

बहुत भारी है
बोझ अनकहे शब्दों का,
ख्वाहिशों की लाश की तरह।
****

एक लफ्ज़
जो खो गया था,
मिला आज
तेरे जाने के बाद।
****

रोज जाता हूँ उस मोड़ पर
जहां हम बिछुड़े थे कभी
अपने अपने मौन के साथ,
लेकिन रोज टूट जाता स्वप्न
थामने से पहले तुम्हारा हाथ,
उफ़ ये स्वप्न भी नहीं होते पूरे
ख़्वाब की तरह.

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, March 12, 2019

मरुधर में बोने सपने हैं


कुछ दर्द अभी तो सहने हैं,
कुछ अश्क़ अभी तो बहने हैं।

मत हार अभी मांगो खुद से,
मरुधर में बोने सपने हैं।

बहने दो नयनों से यमुना,
यादों को ताज़ा रखने हैं।

नींद दूर है इन आंखों से,
कैसे सपने अब सजने हैं।

बहुत बचा कहने को तुम से,
गर सुन पाओ, वह कहने हैं।

कुछ नहीं शिकायत तुमने की,
यह दर्द हमें भी सहने हैं।

हमने मिलकर जो खाब बुने,
अब दफ़्न अकेले करने हैं।

...©कैलाश शर्मा

Thursday, January 17, 2019

क्षणिकाएं

मत बांटो ज़िंदगी
दिन, महीनों व सालों में,
पास है केवल यह पल
जियो यह लम्हा
एक उम्र की तरह।
****

रिस गयी अश्क़ों में
रिश्तों की हरारत,
ढो रहे हैं कंधों पर
बोझ बेज़ान रिश्तों का।
****

एक मौन
एक अनिर्णय
एक गलत मोड़
कर देता सृजित
एक श्रंखला
अवांछित परिणामों की,
भोगते जिन्हें अनचाहे
जीवन पर्यंत।

...©कैलाश शर्मा

Thursday, December 14, 2017

क्षणिकाएं


ढलका नयनों से
नहीं बढ़ी कोई उंगली 
थामने पोरों पर,
गिरा सूखी रेत में 
खो दिया अपना अस्तित्व,
शायद यही नसीब था
मेरे अश्क़ों का।
*****
आज लगा कितना अपना सा 
सितारों की भीड़ में तनहा चाँद 
सदियों से झेलता दर्द 
प्रति दिन घटते बढ़ने का,
जब भी बढ़ता  वैभव
देती चाँदनी भी साथ
लेकिन होने पर अलोप
अस्तित्व प्रकाश का 
कोई भी न होता साथ.
****
काटते रहे अहसास 
फसल शब्दों की,
और कुचल गए शब्द
मौन के पैरों तले।

...©कैलाश शर्मा

Sunday, July 30, 2017

आज दिल ने है कुछ कहा होगा

आज दिल ने है कुछ कहा होगा,
अश्क़ आँखों में थम गया होगा।

आज खिड़की नहीं कोई खोली,
कोइ आँगन में आ गया होगा।

आज सूरज है कुछ इधर मद्धम,
केश से मुख है ढक लिया होगा।

दोष कैसे किसी को मैं दे दूं,
तू न इस भाग्य में लिखा होगा।

दोष मेरा है, न कुछ भी तेरा,
वक़्त ही बावफ़ा न रहा होगा।

...©कैलाश शर्मा

Saturday, August 27, 2016

ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने

ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने,
मौन रह कर सभी सहा तूने।

रात भर अश्क़ थे रहे बहते,
पाक दामन थमा दिया तूने।

लगी अनजान पर रही अपनी,
दर्द अपना नहीं कहा तूने।

फूल देकर सदा चुने कांटे,
ज़ख्म अपना छुपा लिया तूने।


मौत मंज़िल सही जहां जाना,
राह को पुरसुकूँ किया तूने।

~~©कैलाश शर्मा 

Wednesday, February 03, 2016

अश्क़ जब आँख से ढला होगा

अश्क़ जब आँख से ढला होगा,
दर्द दिल का बयां हुआ होगा।

एक तस्वीर उभर आई थी,
ये पता कब धुंआ धुंआ होगा।

बात लब पर थमी रही होगी,
नज्र ने कुछ नहीं कहा होगा।

आज तक दंश गढ़ रहा यह है,
बेवफ़ा समझ के गया होगा।

चाँद का दर्द कौन समझा है,
सुब्ह चुपचाप घर गया होगा।

न कुछ हमने कहा न था तूने,
दास्ताँ कौन गढ़ गया होगा।

बारहा बात सिर्फ़ इतनी थी,
बात कहने न कुछ बचा होगा।


~©कैलाश शर्मा 

Tuesday, November 03, 2015

क्षणिकाएं

उबलते रहे अश्क़
दर्द की कढ़ाई में,
सुलगते रहे स्वप्न
भीगी लकड़ियों से,
धुआं धुआं होती ज़िंदगी
तलाश में एक सुबह की
छुपाने को अपना अस्तित्व
भोर के कुहासे में।

*****

होते हैं कुछ प्रश्न
नहीं जिनके उत्तर,
हैं कुछ रास्ते 
नहीं जिनकी कोई मंजिल,
भटक रहा हूँ 
ज़िंदगी के रेगिस्तान में
एक पल सुकून की तलाश में, 
खो जायेगा वज़ूद
यहीं कहीं रेत में।

...©कैलाश शर्मा

Sunday, October 11, 2015

कुछ क़दम तो चलें

एक दिन तो मिलें,
कुछ क़दम तो चलें।

राह कब एक हैं,
मोड़ तक तो चलें।

साथ जितना मिले,
कुछ न सपने पलें।

राह कितनी कठिन,
अश्क़ पर क्यूँ ढलें।

भूल सब ही गिले,
आज़ फ़िर से मिलें।

...©कैलाश शर्मा 

Monday, December 29, 2014

एक वर्ष और गया


बीता सो बीत गया,
एक वर्ष और गया।

सपने सब धूल हुए
आश्वासन भूल गया,
शहर अज़नबी रहा
और गाँव भूल गया,
एक वर्ष और गया।

तन पर न कपड़े थे
पर अलाव जलता था,
तन तो न ढक पाये
पर अलाव छूट गया,
एक वर्ष और गया।

खुशियाँ बस स्वप्न रहीं
अश्क़ न घर छोड़ सके,
जब भी सपना जागा
जाने क्यों टूट गया,
एक वर्ष और गया।

आश्वासन घट भर पाये
निकले घट सब रीते,
कल कल की आशा में
जीवन है बीत गया,
एक वर्ष और गया।

फ़िर आश्वासन आयेंगे
सपने कुछ जग जायेंगे,
लेकिन कब ठहरा है
अश्क़ जो ढुलक गया,
एक वर्ष और गया।

जब अभाव ज़ीवन हो
वर्ष बदलते कब हैं,
गुज़र दिन एक गया
समझा एक वर्ष गया,
एक वर्ष और गया।

...कैलाश शर्मा 

Saturday, October 04, 2014

अब मैंने जीना सीख लिया

कर बंद पिटारा सपनों का,
बहते अश्क़ों को रोक लिया.
अंतस को जितने घाव मिले
स्मित से उनको ढांक लिया.

विस्मृत कर अब सब रिश्तों को,
अब मैंने फ़िर जीना सीख लिया.

करतल पर खिंची लकीरों को
है ख़ुद मैंने आज खुरच डाला.
अब किस्मत की चाबी मुट्ठी में,
खोलूँगा सभी बेड़ियों का ताला.

नहीं चाह फूलों से आवृत राहें हों,
मैंने काँटों पर चलना सीख लिया.

हर घर में पड़ी खरोंचें हैं,
अहसासों की दीवारों पर.
हर सांसें आज घिसटती हैं,
अश्रु हैं रुके किनारों पर.          

अब पीछे मुड़ कर मैं क्यों देखूं,
सूनी राहों पर चलना सीख लिया.

क्यूँ करूँ तिरस्कृत अँधियारा,
मैं अब इंतज़ार में सूरज के.
है रहा साथ जो जीवन भर,
कैसे चल दूँ उसको तज के.

अब एकाकीपन नहीं सताता है,
आईने में अब साथी ढूंढ लिया.


....कैलाश शर्मा