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Wednesday, April 29, 2015

प्रकृति आक्रोश

करते जब खिलवाड़
अस्तित्व से प्रकृति की 
विकृत करते उसका रूप
विकास के नाम पर,
अंतस का आक्रोश
और आँखों के आंसू
बन जाते कभी सैलाब
कभी भूकंप
और बहा ले जाते
जो भी आता राह में.

समझो घुटन को
प्रकृति की चीत्कार को
दबी कंक्रीट के ढेर के नीचे
तरसती एक ताज़ा सांस को,
प्रकृति नहीं तुम्हारी दुश्मन
फटने लगती छाती दर्द से
देख कर दर्द अपनी संतान का.

संभलो, 
यदि संभल सको, 
अब भी.

....कैलाश शर्मा 

Tuesday, August 28, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (२९वीं-कड़ी)

       सातवाँ अध्याय 
(ज्ञानविज्ञान-योग-७.१-१२

श्री भगवान 

पार्थ लगा मन पूर्ण रूप से
यदि तुम योगाभ्यास करोगे.
मेरे आश्रय में निश्चित ही 
तुम मेरा समग्र रूप जानोगे.  (१)

विज्ञान सहित जो तत्व ज्ञान है,
मैं सम्पूर्ण हूँ वर्णन करता.
जिसे जान लेने पर जग में,
कुछ और जानने योग्य न बचता.  (२)

मनुज सहस्त्रों में से कोई
एक सिद्धि को यत्न है करता.
सिद्धि यत्न करने वालों में,
मेरा तत्व कोई एक समझता.  (३)

है विभक्त आठ भेदों में 
मेरी प्रकृति जान लो अर्जुन.
पृथ्वी, जल, अग्नि व नभ, 
वायु, बुद्धि, दम्भ और मन.  (४) 

जो है विभक्त आठ भेदों में 
वह मेरी निक्रष्ट प्रकृति है.
जिससे जग हूँ धारण करता,
जीव रूप वह श्रेष्ठ प्रकृति है.  (५)

मेरी ही इन दोनों प्रकृति से
समस्त विश्व उत्पन्न है होता.
मैं ही सृजक सम्पूर्ण विश्व का,
एवं मैं ही उसका संहारक होता.  (६)

नहीं उच्चतर मुझसे अर्जुन
कोई वस्तु है सर्व विश्व में.
धागे में मनकों के जैसा 
विश्व पिरोया हुआ है मुझमें.  (७)

जल में स्वाद,प्रभा रवि शशि में,
हूँ ओंकार समस्त वेदों में.
शब्द हूँ मैं आकाश में अर्जुन,
व पुरुषत्व सभी पुरुषों में.  (८)

मैं पवित्र गंध पृथ्वी में,
व अग्नि में तेज भी मैं हूँ.
जीवन हूँ मैं सब प्राणी में
और तपस्वियों में तप हूँ.  (९)

सर्व चराचार जग का अर्जुन
बीज सनातन मुझे ही जानो.
बुद्धिमान की बुद्धि भी मैं हूँ,
तेजस्वी का तेज भी मानो.  (१०)

रहित काम और राग से जो हैं 
उन बलशाली का बल भी मैं हूँ.
जो अनुकूल धर्म के रहता 
प्राणीजन में वह काम भी मैं हूँ.  (११)

सत्, रज, तम भाव भी अर्जुन,
मुझ से ही उत्पन्न हैं मानो.
मैं न कभी आधीन हूँ उनके,
उनको मेरे आधीन ही जानो.  (१२)

          ........क्रमशः

कैलाश शर्मा