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Saturday, September 24, 2016

संवेदनहीनता

दफ्न हैं अहसास
मृत हैं संवेदनाएं,
घायल इंसानियत
ले रही अंतिम सांस
सड़क के किनारे,
गुज़र जाता बुत सा आदमी
मौन करीब से.

नहीं है अंतर गरीब या अमीर में
संवेदनहीनता की कसौटी पर.

...©कैलाश शर्मा 

Tuesday, March 31, 2015

क्षणिकाएं

ज़िंदगी के थपेड़े 
सुखा देते अहसास 
और मानवीय संवेदनाएं
बना देते पत्थर
और तराश देता समय 
एक बुत जीते जी।
क्या तुमने सुनी है
मौन चीत्कार उसकी
जिसे बना दिया बुत
ज़िंदगी के हालातों ने।
    ***
उखाड़ता हूँ जड़ से 
रोज़ सुबह एक पौधा यादों का,
फ़िर उग आता पौधा नया
हर शाम को ज़मीन से
और चुभने लगते कांटे रात भर।
न जाने छुपे हैं कितने 
बीज यादों के ज़मीन में
जो उग आते रोज़ शाम ढले।
    ***
जब भी पाया अकेला 
दिया तुमने साथ 
नहीं छोड़ा हाथ 
एक भी पल को।
मेरे दर्द,
न छोड़ना साथ
मेरे सपनों की तरह,
मुश्किल होगा जीना 
बिखर जायेगा अस्तित्व
तुम्हारे बिना।

...कैलाश शर्मा