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Saturday, September 24, 2016
संवेदनहीनता
लेबल:
Kashish-My Poetry,
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मौन,
संवेदनहीनता
Monday, June 24, 2013
ख़ुदा खैर करे
आये बड़ी उम्मीद से, ख़ुदा
खैर करे,
तेरे दर मौत मिली, ख़ुदा खैर
करे.
दिल दहल जाता है देख कर
मंज़र,
क्या गुज़री उन पर, ख़ुदा खैर
करे.
उभर आती मुसीबत में असली सीरत,
लूटते हैं लाशों को भी,
ख़ुदा खैर करे.
मुसीबतज़दा को कभी हाथ बढ़ा
करते थे,
भूखे से भी करें व्यापार,
ख़ुदा खैर करे.
इंसानियत हो रही शर्मसार आज
इंसां से,
दो सौ रुपये में दें पानी,
ख़ुदा खैर करे.
होंगे शर्मिंदा बहुत आज तो
तुम भी भगवन,
तेरे
बंदे ही तुझे लूट चले, ख़ुदा खैर करे.
.....कैलाश शर्मा
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Wednesday, April 24, 2013
इंसानियत कराह रही अब मेरे शहर में
(चित्र गूगल से साभार)
दहशतज़दा
है हर चेहरा मेरे शहर में,
इंसान
नज़र आते न अब मेरे शहर में.
अहसास
मर गए हैं, इंसां हैं मुर्दों जैसे,
इक
बू अज़ब सी आती है मेरे शहर में.
हर
नज़र है कर जाती चीर हरण मेरा,
महफूज़
नहीं गलियां अब मेरे शहर में.
घर
हो गए मीनारें, इंसान हुआ छोटा,
रिश्तों
में न हरारत, अब मेरे शहर में.
लब
भूले मुस्कराना, तन्हाई है आँखों में,
मिलते
हैं अज़नबी से सब मेरे शहर में.
दौलत
है छुपा देती हर ऐब है इंसां का,
इंसानियत
कराह रही अब मेरे शहर में.
.....कैलाश शर्मा
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