जीवन सीमित जब रोटी तक,
स्वप्न नहीं आँखों में कल का,
चौराहे पर खड़ा हो बचपन,
पूछो उनसे क्या प्रेम दिवस है.
नहीं मिला जो काम अगर तो,
न मिल पाये बच्चों को रोटी,
नहीं जो बिक पाये गुलाब गर,
भूखे पेट क्या प्रेम दिवस है।
न मिल पाये बच्चों को रोटी,
नहीं जो बिक पाये गुलाब गर,
भूखे पेट क्या प्रेम दिवस है।
चुम्बन, आलिंगन, गुलाब
क्या,
नहीं अभाव का जीवन समझे,
जिस दिन दो रोटी मिल जायें
उनको वह दिन प्रेम दिवस है।
नहीं अभाव का जीवन समझे,
जिस दिन दो रोटी मिल जायें
उनको वह दिन प्रेम दिवस है।
सिर पर बोझ उठाये फिरता,
घर घर झाड़ू पोंछा जो करती,
थकी थकी हर शाम है आती,
कैसा, किसका प्रेम दिवस है?
घर घर झाड़ू पोंछा जो करती,
थकी थकी हर शाम है आती,
कैसा, किसका प्रेम दिवस है?
प्रेम नहीं अभिव्यक्ति शब्द में,
प्रेम है बस मन की अनुभूति,
अंतस में जब प्यार बसा हो,
समझो हर दिन प्रेम दिवस है।
प्रेम है बस मन की अनुभूति,
अंतस में जब प्यार बसा हो,
समझो हर दिन प्रेम दिवस है।
....कैलाश शर्मा