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Friday, May 03, 2019

क्षणिकाएं


गीला कर गया
आँगन फिर से,
सह न पाया
बोझ अश्क़ों का,
बरस गया।
****

बहुत भारी है
बोझ अनकहे शब्दों का,
ख्वाहिशों की लाश की तरह।
****

एक लफ्ज़
जो खो गया था,
मिला आज
तेरे जाने के बाद।
****

रोज जाता हूँ उस मोड़ पर
जहां हम बिछुड़े थे कभी
अपने अपने मौन के साथ,
लेकिन रोज टूट जाता स्वप्न
थामने से पहले तुम्हारा हाथ,
उफ़ ये स्वप्न भी नहीं होते पूरे
ख़्वाब की तरह.

...©कैलाश शर्मा

Monday, February 04, 2019

मन का आँगन प्यासा है


बरस गया सावन तो क्या है, मन का आँगन प्यासा है।
एक बार फिर तुम मिल जाओ, केवल यह अभिलाषा है।

अपनी अपनी राह चलें हम,
शायद नियति हमारी होगी।
मिल कर दूर सदा को होना,
विधि की यही लकीरें होंगी।

इंतज़ार के हर एक पल ने, बिखरा दिए स्वप्न आँखों के,
रिक्त हुए हैं अश्रु नयन के, मन में गहन पिपासा है।

साथ रहा जो कुछ कदमों का
जीवन भर का दर्द बन गया।
अहसासों में बसती जो गर्मी
अब स्पंदन है सर्द बन गया।

जाने से पहले कुछ कहते, बोझ जुदाई कुछ कम होता,
मौन दे गया प्रश्न अबूझे, अंतस में गहन कुहासा है।

एक जन्म का साथ न पाया,
जन्म जन्म का स्वप्न व्यर्थ है।
फिसल गयी जो रेत हाथ से,
उसके संचय की आस व्यर्थ है।

स्वप्न अधिक न पालो मन में, स्वप्न टूटने पर दुख होता,
हर पल को मुट्ठी में बांधो, जीवन बस एक तमाशा है।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, November 03, 2015

क्षणिकाएं

उबलते रहे अश्क़
दर्द की कढ़ाई में,
सुलगते रहे स्वप्न
भीगी लकड़ियों से,
धुआं धुआं होती ज़िंदगी
तलाश में एक सुबह की
छुपाने को अपना अस्तित्व
भोर के कुहासे में।

*****

होते हैं कुछ प्रश्न
नहीं जिनके उत्तर,
हैं कुछ रास्ते 
नहीं जिनकी कोई मंजिल,
भटक रहा हूँ 
ज़िंदगी के रेगिस्तान में
एक पल सुकून की तलाश में, 
खो जायेगा वज़ूद
यहीं कहीं रेत में।

...©कैलाश शर्मा

Thursday, June 04, 2015

भटकते शब्द

मन से मन का संवाद
कुंवारी साँसों का स्पंदन,
विस्तार स्वप्नों का
आँखों से आँखों तक,
अनछुए स्पर्श की
सनसनाहट रग रग में,
अंतस के अहसासों की
एक चमक नज़रों में,
हो गए सब बेमानी
न व्यक्त होने से केवल शब्दों में।

देखता है खड़ा दूर से
बना अनजान हालात से
चहुँ ओर घूमते शब्दों को
नहीं आ पाए जो कभी हाथ में
और आज खो दिया अर्थ
होने या न होने का

....© कैलाश शर्मा 

Thursday, February 13, 2014

कैसा, किसका प्रेम दिवस है?

जीवन सीमित जब रोटी तक,
स्वप्न नहीं आँखों में कल का,    
चौराहे पर खड़ा हो बचपन,
पूछो उनसे क्या प्रेम दिवस है.

नहीं मिला जो काम अगर तो,
न मिल पाये बच्चों को रोटी,
नहीं जो बिक पाये गुलाब गर,
भूखे पेट क्या प्रेम दिवस है।

चुम्बन, आलिंगन, गुलाब क्या,
नहीं अभाव का जीवन समझे,
जिस दिन दो रोटी  मिल जायें 
उनको वह दिन प्रेम दिवस है।

सिर पर बोझ उठाये फिरता,
घर घर झाड़ू पोंछा जो करती,
थकी थकी हर शाम है आती,
कैसा, किसका प्रेम दिवस है?

प्रेम नहीं अभिव्यक्ति शब्द में,
प्रेम है बस मन की अनुभूति,
अंतस में जब प्यार बसा हो,
समझो हर दिन प्रेम दिवस है।


....कैलाश शर्मा