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Tuesday, December 16, 2014

जीवन नौका

मत बांधो जीवन नौका
किसी किनारे सागर के   
रिश्तों की ड़ोर से,
आती जाती हर लहर
टकरायेगी नौका को
बार बार किनारे से,
और लौट जायेगी
देकर एक नयी चोट  
करके तन क्षत-विक्षत.

छोड़ दो नौका लहरों के सहारे,
शायद न मिले मंज़िल
पर होगा बेहतर डूब जाना
चोट लगने से अंतस को
पल पल बंधकर मज़बूर ड़ोर से.


...कैलाश शर्मा