Showing posts with label डोर. Show all posts
Showing posts with label डोर. Show all posts
Tuesday, December 16, 2014
Saturday, August 24, 2013
पतंग और डोर
उड़ती मुक्त गगन में
लिये ख़्वाब छूने का
अनंत आकाश का छोर,
पर कहाँ है स्वतंत्र
बंधी
है एक डोर
है जिसका दूसरा छोर
किसी अन्य के हाथों में
उड़ान भरने से ऊपर
पहुँचने तक,
उड़ पाती है उतना ही
ऊँचा
जितनी पाती ढील डोर.
हो कर रह गया निर्भर
अस्तित्व केवल डोर पर,
जब भी कट जाती डोर
अनुभव होती आजादी
केवल कुछ पल की,
गिरने लगती
ज़मीन की ओर
और फंस जाती
किसी पेड़ या खंबे पर,
फड़फडाती पल पल
हवा के हर झोंके से
या पहुँच जाती
किसी अज़नबी हाथों में
उड़ने फ़िर
साथ नयी डोर.
उड़ती रही सदैव
पतंग की तरह
बंधी किसी न किसी
रिश्ते की डोर से.
काश होता उसका भी
स्वतंत्र अस्तित्व,
उड़ पाती बिन डोर
कर पाती पूरा सपना
छूने का आसमान
बिना किसी सहारे.
....कैलाश शर्मा
लेबल:
अस्तित्व,
डोर,
पतंग,
मुक्त गगन,
सर्वाधिकार सुरक्षित
Subscribe to:
Posts (Atom)

