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Tuesday, December 16, 2014

जीवन नौका

मत बांधो जीवन नौका
किसी किनारे सागर के   
रिश्तों की ड़ोर से,
आती जाती हर लहर
टकरायेगी नौका को
बार बार किनारे से,
और लौट जायेगी
देकर एक नयी चोट  
करके तन क्षत-विक्षत.

छोड़ दो नौका लहरों के सहारे,
शायद न मिले मंज़िल
पर होगा बेहतर डूब जाना
चोट लगने से अंतस को
पल पल बंधकर मज़बूर ड़ोर से.


...कैलाश शर्मा

Saturday, August 24, 2013

पतंग और डोर

उड़ती मुक्त गगन में
लिये ख़्वाब छूने का
अनंत आकाश का छोर,
पर कहाँ है स्वतंत्र
बंधी है एक डोर          
है जिसका दूसरा छोर
किसी अन्य के हाथों में
उड़ान भरने से ऊपर पहुँचने तक,
उड़ पाती है उतना ही ऊँचा
जितनी पाती ढील डोर.

हो कर रह गया निर्भर
अस्तित्व केवल डोर पर,
जब भी कट जाती डोर
अनुभव होती आजादी
केवल कुछ पल की,
गिरने लगती
ज़मीन की ओर
और फंस जाती
किसी पेड़ या खंबे पर,
फड़फडाती पल पल
हवा के हर झोंके से
या पहुँच जाती
किसी अज़नबी हाथों में
उड़ने फ़िर
साथ नयी डोर.

उड़ती रही सदैव
पतंग की तरह
बंधी किसी न किसी
रिश्ते की डोर से.
काश होता उसका भी
स्वतंत्र अस्तित्व,
उड़ पाती बिन डोर
कर पाती पूरा सपना
छूने का आसमान
बिना किसी सहारे.

....कैलाश शर्मा