रश्मि प्रभा जी और किशोर खोरेन्द्र जी द्वारा संपादित काव्य-संग्रह 'बालार्क' में सामिल मेरी रचनाओं में से एक रचना
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डोर से कटी पतंग
बढ़ती स्वच्छंद
अनंत गगन में
अनभिज्ञ अपनी नियति
से
कहाँ गिरेगी जाकर,
जीने दो कुछ पल
बिना डोर के बंधन
के.
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भागते साथ भीड़ के
आता है याद
वो बरगद का पेड़,
संतुष्टि की घनी
पगडंडियों
चेहरों पर,
ताकती उदास आँखों से
शहर को जाती सड़क.
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कितना खोया
कुछ पाने की चाहत में,
ताकता हसरत से
खुशियों से भरी सड़क
जाती गाँव को,
जो बन गयी
आज अज़नबी.
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कल की तलाश में
निकल जाता आज,
मुट्ठी से
रेत की तरह.
....कैलाश शर्मा
(हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित 'बालार्क' अधिकांश ई-स्टोर्स पर उपलब्ध)
