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Friday, December 06, 2013

ख़्वाहिशें

रश्मि प्रभा जी और किशोर खोरेन्द्र जी द्वारा संपादित काव्य-संग्रह 'बालार्क' में सामिल मेरी रचनाओं में से एक रचना
                                                                  *****
डोर से कटी पतंग
बढ़ती स्वच्छंद
अनंत गगन में
अनभिज्ञ अपनी नियति से
कहाँ गिरेगी जाकर,
जीने दो कुछ पल
बिना डोर के बंधन के.
*****
भागते साथ भीड़ के
आता है याद
वो बरगद का पेड़,
संतुष्टि की घनी पगडंडियों
चेहरों पर,
ताकती उदास आँखों से
शहर को जाती सड़क.
*****
कितना खोया
कुछ पाने की चाहत में,
ताकता हसरत से
खुशियों से भरी सड़क
जाती गाँव को,
जो बन गयी
आज अज़नबी.
*****
कल की तलाश में
निकल जाता आज,
मुट्ठी से
रेत की तरह.


....कैलाश शर्मा 

(हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित 'बालार्क' अधिकांश ई-स्टोर्स पर उपलब्ध)

Saturday, August 24, 2013

पतंग और डोर

उड़ती मुक्त गगन में
लिये ख़्वाब छूने का
अनंत आकाश का छोर,
पर कहाँ है स्वतंत्र
बंधी है एक डोर          
है जिसका दूसरा छोर
किसी अन्य के हाथों में
उड़ान भरने से ऊपर पहुँचने तक,
उड़ पाती है उतना ही ऊँचा
जितनी पाती ढील डोर.

हो कर रह गया निर्भर
अस्तित्व केवल डोर पर,
जब भी कट जाती डोर
अनुभव होती आजादी
केवल कुछ पल की,
गिरने लगती
ज़मीन की ओर
और फंस जाती
किसी पेड़ या खंबे पर,
फड़फडाती पल पल
हवा के हर झोंके से
या पहुँच जाती
किसी अज़नबी हाथों में
उड़ने फ़िर
साथ नयी डोर.

उड़ती रही सदैव
पतंग की तरह
बंधी किसी न किसी
रिश्ते की डोर से.
काश होता उसका भी
स्वतंत्र अस्तित्व,
उड़ पाती बिन डोर
कर पाती पूरा सपना
छूने का आसमान
बिना किसी सहारे.

....कैलाश शर्मा