Kashish - My Poetry
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Monday, January 04, 2016
ज़ब ज़ब शाम ढली
ज़ब ज़ब शाम ढली
,
हर पल आस पली।
ज़ीवन बस उतना
,
जब तक सांस चली।
दिन गुज़रा सूना
,
तनहा शाम ढली।
खुशियाँ कब ठहरी
,
कल पर बात टली।
सूनी राह दिखी
,
मन में पीर पली।
अपना कौन यहाँ
,
झूठी आस पली।
मंज़िल दूर नहीं
,
सांसें टूट चली।
...
©
कैलाश शर्मा
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