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Thursday, February 14, 2019

क्षणिकाएं


जब भी पीछे मुड़कर देखा
कम हो गयी गति कदमों की,
जितना गंवाया समय
बार बार पीछे देखने में
मंज़िल हो गयी उतनी ही दूर 
व्यर्थ की आशा में।
****

बदल जाते हैं शब्दों के अर्थ
व्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,
लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थ
अगर समझ पाओ तो।

****

झुलसते अल्फाज़,
कसमसाते अहसास
होने को अभिव्यक्त,
पूछती हर साँस
सबब वापिस आने का,
केवल एक तुम्हारे न होने से।

...©कैलाश शर्मा

Wednesday, May 02, 2018

अनकहे शब्द


फंस जाते जब शब्द 
भावनाओं के अंधड़ में
और रुक जाते कहीं 
जुबां पर आ कर,
ज़िंदगी ले लेती 
एक नया मोड़।

सुनसान पलों में
जब भी झांकता पीछे,
पाता हूँ खड़े 
वे रुके हुए शब्द 
जो भटक रहे हैं
आज़ भी आँधी में,
तलाशते वह मंज़िल
जो खो गयी कहीं पीछे।

...©कैलाश शर्मा

Friday, October 27, 2017

चलो पथिक आगे बढ़ जाओ

चलो पथिक आगे बढ़ जाओ,
यहाँ किसी का साथ न होगा।
नियति है तेरी चलना तनहा,
यहाँ कोइ हमराह न होगा।

कुछ पल की रौनक है जीवन,
फिर आगे का सफ़र अकेला।
इक दिन अंत इसे है होना,
हर दिन कहाँ चले है मेला।

कच्चे धागे से सब रिश्ते,
कब तक साथ निभा पायेंगे।
बोझ बढाओ मत कंधों पर,
कितनी दूर उठा पायेंगे।

छांव मिलेगी नहीं राह में,  
मरुथल से है तुम्हें गुज़रना|
अश्क़ रखो अपने संभाल के
अभी बहुत कुछ आगे सहना|      

सक्षम करलो तुम पग अपने,
अभी राह में शूल बहुत हैं।
भ्रमित न हो खुशियों के पल में
अभी तो मंजिल दूर बहुत है।

दुखित न हो पिछली भूलों से,
दे कर गयीं सबक जीवन का।
कौन सदा का साथ यहां है,
चलना यहां अकेला पड़ता।

...©कैलाश शर्मा

Monday, January 04, 2016

ज़ब ज़ब शाम ढली

ज़ब ज़ब शाम ढली,
हर पल आस पली।

ज़ीवन बस उतना,
जब तक सांस चली।

दिन गुज़रा सूना,
तनहा शाम ढली।

खुशियाँ कब ठहरी,
कल पर बात टली।

सूनी राह दिखी,
मन में पीर पली।

अपना कौन यहाँ,
झूठी आस पली।

मंज़िल दूर नहीं,
सांसें टूट चली।

...©कैलाश शर्मा

Saturday, September 26, 2015

प्रकाश स्तम्भ

प्रकाश स्तम्भ
नहीं एक मंज़िल,
सिर्फ़ एक संबल
दिग्भ्रमित नौका को,
दिखाता केवल राह
लेना होता निर्णय
चलाना होता चप्पू 
स्वयं अपने हाथों से।


आसान है सौंप देना
नाव लहरों के सहारे
शायद पहुंचे किसी तट पर
न हो जो इच्छित मंज़िल
या डूब जाए बीच धारा में,
केवल प्रकाश स्तम्भ
या पतवार नौका में
कब है पहुंचाती 
इच्छित मंज़िल को,
करनी होती स्थिर 
दृष्टि प्रकाश स्तम्भ पर,
चलाने होते पतवार अपने हाथों से
रोकने को बहने से नाव 
लहरों के साथ।

....©कैलाश शर्मा

Tuesday, September 02, 2014

निभाया साथ बहुत है ज़िंदगी तूने

दिया है दर्द, अब वही दवा देगा,
मिलेगी मंजिल वही हौसला देगा।

गुनाह गर था जो चाहना उसको,
वही है मुंसिफ़ वही फैसला देगा।

न राह हमने चुनी है, न मंजिल ही,
कहां है जाना वही फैसला लेगा।

गुज़र गया है काफ़िला भी अब आगे,
राह सूनी में चलने का हौसला देगा।

निभाया साथ बहुत है ज़िंदगी तूने,
वक़्त-ए-रुख्सत पे हौसला देगा।
   
   (अगज़ल/अभिव्यक्ति)


...कैलाश शर्मा 


Wednesday, July 24, 2013

आख़िरी सफ़र

कितने भारी लगते             
एक एक पल
मंजिल के निकट आने पर,
थके कदम करते इंकार
आगे बढ़ने को,
टूटे अहसासों का बोझ
चाहता बह जाना
अश्क़ों में.

थके कदमों को
रुकने दें कुछ देर
आख़िरी मंज़िल से पहले,
बहने दें अश्क़ों में
टूटे अहसासों का बोझ,
होने दें शांत कुछ पल
रिश्तों से मिली जलन,
मिलेगा कुछ तो सुकून
और कम होगा कुछ बोझ
शेष यात्रा में.


...कैलाश शर्मा

Tuesday, May 14, 2013

किस पिंज़रे में फ़स गया


                                                          (चित्र गूगल से साभार)

एक बार तेरे शहर में आकर जो बस गया,     
ता-उम्र फड़फडाता, किस पिंज़रे में फ़स गया.

नज़रें नहीं मिलाता, कोई यहाँ किसी से,
एक अज़नबी हूँ भीड़ में, यह दर्द डस गया.

रिश्तों की हर गली से गुज़रा मैं शहर में,
स्वारथ का मकडजाल, मुझे और क़स गया.

साये में उनकी ज़ुल्फ़ के ढूंढा किये सुकून,
वह छोड़ हम को धूप में महलों में बस गया.

आती हैं याद मुझ को गलियां वो गाँव की,
वह ख़्वाब अश्क़ बन के आँखों में बस गया.

ऊंचे हैं ख़्वाब सब के, पैरों तले ज़मीं न,
ज़ब भी गिरा ज़मीं पर, दलदल में फ़स गया.

न मिल ही पायी मंज़िल, गुम हो गयी हैं राहें,
इस कशमकश-ए-हयात में, कैसे मैं फ़स गया.

....कैलाश शर्मा