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Wednesday, October 23, 2019

जीवन यात्रा


कितनी दूर चला आया हूँ,
कितनी दूर अभी है जाना।
राह है लंबी या ये जीवन,
नहीं अभी तक मैंने जाना।

नहीं किसी ने राह सुझाई,
भ्रमित किया अपने लोगों ने।
अपनी राह न मैं चुन पाया,
बहुत दूर जाने पर जाना।

बढ़े हाथ उनको ठुकराया,
अपनों की खुशियों की खातिर।
लेकिन आज सोचता हूँ मैं,
अपने दिल की क्यूँ न माना।

माना समय नहीं अब बाकी,
जो भी बचा उसे अपनाया।
जो भी रेत बचा मुट्ठी में,
उसको ही उपलब्धि माना।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, June 07, 2016

ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है

ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है,
रोज़ देती सजा सी लगती है।

रौनकें सुबह की हैं कुछ फीकी,
शाम भी बेमज़ा सी लगती है।

राह जिस पर चले थे हम अब तक,
आज वह बेवफ़ा सी लगती है।

संदली उस बदन की खुशबू भी,
आज मुझको कज़ा सी लगती है।

दर्द जो भी मिला है दुनिया में,
यार तेरी रज़ा सी लगती है।

...© कैलाश शर्मा 

Monday, January 04, 2016

ज़ब ज़ब शाम ढली

ज़ब ज़ब शाम ढली,
हर पल आस पली।

ज़ीवन बस उतना,
जब तक सांस चली।

दिन गुज़रा सूना,
तनहा शाम ढली।

खुशियाँ कब ठहरी,
कल पर बात टली।

सूनी राह दिखी,
मन में पीर पली।

अपना कौन यहाँ,
झूठी आस पली।

मंज़िल दूर नहीं,
सांसें टूट चली।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, November 17, 2015

ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री

शाम भी शाम सी नही गुज़री,
रात भी याद में नही गुज़री।

आज भी हम खड़े रहे दर पर,
तू मगर राह से नही गुज़री।

कौन किसका हबीब हो पाया,
ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री।

दर्द ने राह क्यूँ वही पकड़ी,
राह जिस पर ख़ुशी रही ठहरी।


तू न मेरी नज़र समझ पाया,
बात इतनी भी थी नही गहरी।

...©कैलाश शर्मा

Monday, October 27, 2014

चौराहा

चौराहे पर खड़ा हूँ कब से, 
भ्रमित चुनूँ मैं राह कौन सी।
कौन राह मंज़िल को जाए,
अंध गली ले जाय कौन सी।

जितने पार किये चौराहे,
नया दर्द हर राह दे गयी।
बोझ बढ़ गया है कंधों पे,

दृष्टि धूमिल आज हो गयी।

कितने मीत बने रस्ते में,
चले गये सब अपनी राहें।
दूर कारवां चला गया है,
तकता अब बस सूनी राहें।

सूनी राहों पर चलते रहना,
शायद यही नियति है मेरी।
घिरा हुआ था कभी भीड़ से,
भूल गया क्या खुशियाँ मेरी।

क्या उद्देश्य यहाँ आने का,
भूल गया जग की माया में।
अंतस की आवाज़ सुनी न,
कुछ पल रिश्तों की छाया में।

सांध्य अँधेरा लगा है बढ़ने,
नहीं सुबह की आस है बाक़ी।
पैमाना खाली, पर उठ चल,
चली गयी महफ़िल से साक़ी।

....कैलाश शर्मा  

Tuesday, September 02, 2014

निभाया साथ बहुत है ज़िंदगी तूने

दिया है दर्द, अब वही दवा देगा,
मिलेगी मंजिल वही हौसला देगा।

गुनाह गर था जो चाहना उसको,
वही है मुंसिफ़ वही फैसला देगा।

न राह हमने चुनी है, न मंजिल ही,
कहां है जाना वही फैसला लेगा।

गुज़र गया है काफ़िला भी अब आगे,
राह सूनी में चलने का हौसला देगा।

निभाया साथ बहुत है ज़िंदगी तूने,
वक़्त-ए-रुख्सत पे हौसला देगा।
   
   (अगज़ल/अभिव्यक्ति)


...कैलाश शर्मा 


Tuesday, July 01, 2014

एक टुकड़ा बादल

एक टुकड़ा बादल       
भटक कर अपनी राह
बरस गया मेरे आँगन में,
बुझा गया प्यास
वर्षों से तृषित अंतर्मन की.

बरसते हैं बादल आज भी
भिगो कर गुज़र जाते आँगन भी
पर प्यासा ही रह जाता अंतर्मन.

तलाशती हैं आँखें
बादल का वह टुकड़ा
गुज़रते घने बादलों में 
आज़ भी.

...कैलाश शर्मा