Wednesday, December 01, 2010

बिखराव एक स्वप्न का

रोपा था एक पौधा
घर के आँगन में,
आशा में
बड़े होकर देगा फल 
और घनी छांव
जिसके नीचे 
सुकून से बैठूँगा बुढापे में.

तेज धूप से दी उसे छांव, 
जब भी देखा उसको मुरझाते
किया सिंचित और  
सहलाया प्यार से,
उसको बढते देखने में ही
होगयीं सारी खुशियाँ  केंद्रित.

क्या कहूँ 
नियति  का खेल 
या मेरा प्रारब्ध,
आज वह पौधा
जब बन गया विशाल वृक्ष ,
उसके फल
मेरी पहुँच से बहुत ऊँचें,
उसकी छांव पड़ती है
दूसरे आँगन में,
और मैं खड़ा हूँ 
तपती धूप में
ढूंढता ठंडक
अपनी ही परछाईं की
छाया में.

33 comments:

  1. उसकी छांव पड़ती है
    दूसरे आँगन में,
    और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    ढूंढता ठंडक
    अपनी ही परछाईं की
    छाया में.
    ज़िन्दगी का कडवा सच कह दिया।

    ReplyDelete
  2. आज के परिवेश को बताती सच्ची रचना ....अब तो बिना किसी उम्मीद के ही पौधों ( बच्चों ) की परवरिश करनी चाहिए ...

    ReplyDelete
  3. उसके फल
    मेरी पहुँच से बहुत ऊँचें,
    उसकी छांव पड़ती है
    दूसरे आँगन में,
    और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    वर्तमान परिवेश को पूरी तरह से अभिव्यंजित करती कविता ....अब तो किसी से कोई आस रखने की जरुरत नहीं ..बस अपना फर्ज अदा करो .....शुक्रिया

    ReplyDelete
  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (2/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    ReplyDelete
  5. आज के इस "वर्तमान" को
    बखूबी परिभाषित करती हुई
    नायाब रचना ...
    शब्द-शब्द मन में कहीं गहरे उतर रहा है

    अभिवादन .

    ReplyDelete
  6. आज वह पौधा
    जब बन गया विशाल वृक्ष ,
    उसके फल
    मेरी पहुँच से बहुत ऊँचें,
    उसकी छांव पड़ती है
    दूसरे आँगन में,
    और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    ढूंढता ठंडक
    अपनी ही परछाईं की
    छाया में.....

    वाह कैलाश जी ... आज की आपकी रचना ने निशब्द कर दिया ... .उम्दा प्रस्तुति .. ..

    ReplyDelete
  7. वह पौधा वृक्ष होकर किसी और राही को छाया दे रहा है ...
    मानती हूँ कि यह आत्मसंतोष इतना आसान नहीं ...
    मगर दिल तो बहल जाएगा ...!

    ReplyDelete
  8. आज वह पौधा
    जब बन गया विशाल वृक्ष ,
    उसके फल
    मेरी पहुँच से बहुत ऊँचें,
    उसकी छांव पड़ती है
    दूसरे आँगन में,
    और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    ढूंढता ठंडक
    अपनी ही परछाईं की
    छाया में

    बहोत ही सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  9. बहुत ही गहराई से बहुत ही बड़ी बात कहती हुई,दिल को छू लेने वाली कविता.

    सादर

    ReplyDelete
  10. बागबां का धर्म यही
    तूफा से बचाये पौधे को
    इक दिन फल पक कर गिरने पर
    तेरी ही झोली ढूढेगा

    ReplyDelete
  11. गूढ अर्थों से सज्जित... जीवन का यथार्थ । उत्तम.

    ReplyDelete
  12. आज वह पौधा
    जब बन गया विशाल वृक्ष ,
    उसके फल
    मेरी पहुँच से बहुत ऊँचें,
    उसकी छांव पड़ती है
    दूसरे आँगन में,
    और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    ढूंढता ठंडक
    अपनी ही परछाईं की
    छाया में.....

    वाह कैलाश जी .बहुत ही गहराई से बहुत ही बड़ी बात कहती हुई,दिल को छू लेने वाली कविता... आज की आपकी रचना ने निशब्द कर दिया ... .उम्दा प्रस्तुति .. ..

    ReplyDelete
  13. आज के परिवेश पर सीधा कटाक्ष.
    मर्मस्पर्शी रचना.

    ReplyDelete
  14. jindgi ke yatharth ka marmik chitr hai....
    hridayshparsi evam marmik rachna...
    dil ko chhoo gayee !

    ReplyDelete
  15. दूर हो गए फल जो पंछी खायेंगे वे भी तो उसी ने बनाये हैं जिसने उसे जिसके आंगन में छाया पड़ती है,जब तक खुद से दूरी है तभी तक कोई पराया है, अब तो सारी शिकायत छोड़ कर उस एक का पता लगाना है, है न?

    ReplyDelete
  16. बाऊ जी,
    नमस्ते!
    कविता तो अच्छी है, मगर कल्पना ही रहे तो बेहतर!
    सादर,
    आशीष
    --
    नौकरी इज़ नौकरी!

    ReplyDelete
  17. उसकी छांव पड़ती है
    दूसरे आँगन में
    और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    ढूंढता ठंडक
    अपनी ही परछाईं की
    छाया में

    कविता पढ़कर मन ने इस में व्यक्त भावों के साथ तादात्म्य महसूस किया।
    आभार आपका।

    ReplyDelete
  18. यही जीवन का कटु सत्य है आजकल के समय में...जिस से सबको रु-ब-रु होना है. सुंदर रचना.

    ReplyDelete
  19. कैलाश जी,
    आपने जीवन की कड़वी सच्चाई को बड़ी ही सहजता से उकेरा है, कविता मन को उद्वेलित करती है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    ReplyDelete
  20. पेड़ की क्या घरों की भी यही हालात है. दो दो निशाने साधती है ये कविता.बढ़िया है.

    ReplyDelete
  21. बड़े भाई प्रणाम //
    आप छोटे भाई के ब्लॉग पर आये ....मेरी ख़ुशी का क्या कहना //
    बड़ा ही गंभीर बात आपने बातो बातो में कह डाली //
    आज के बच्चे पढ़ लिखकर विधेश चले जा रहे है //
    माँ -पिता की स्थिति तो दसरथ जैसी हो जा रही है //
    मैंने भी इसी संदर्भव में likha hai //

    ReplyDelete
  22. आज वह पौधा
    जब बन गया विशाल वृक्ष ,
    उसके फल
    मेरी पहुँच से बहुत ऊँचें,
    उसकी छांव पड़ती है
    दूसरे आँगन में,
    और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    ढूंढता ठंडक
    अपनी ही परछाईं की
    छाया में.....

    बहुत गहराई से लिखी गई रचना और जीवन का कटु सत्य...बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  23. Expectations are the cause of pain...

    Very deep thought.. Sangeeta ji ki baat se sahmat hu m bhi

    ReplyDelete
  24. बहुत खूब .. ये जीवन भी कुछ कुछ ऐसा ही है ... आज का दौर है ये ... अपने भी अपनों को चंव नहीं देना चाहते ....

    ReplyDelete
  25. ज़िन्दगी का कडवा सच|दिल को छू लेने वाली कविता|

    ReplyDelete
  26. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 07-12 -2010
    को छपी है ....
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    ReplyDelete
  27. papa ki yaad aa gayi... bahut sunder rachna!

    ReplyDelete
  28. ye kaisi vidambana hai...!!!
    sundar gahan abhivyakti!!

    ReplyDelete
  29. और मैं खड़ा हूँ
    तपती धूप में
    ढूंढता ठंडक
    अपनी ही परछाईं की
    छाया में.

    अपनी छाया में रहना होगा

    ReplyDelete
  30. Oh my god sir....kya khoob kaha hai aapne, ped ki chhaanv tale, kitni badi baat keh gaye aap, bas yahi chahungi, ke mere papa ko kabhi aisi nazm ikhne ka mauka na mile....pranaam aapko sir

    ReplyDelete
  31. अफ़सोस ...
    भविष्य में आपको पढने के लिए मैं आपका प्रसंशक बन रहा हूँ आप वाकई अच्छा लिखते हैं !
    शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  32. कटु सत्य! आज के परिवेश का. क्या कहें, सब समझ ले तो छाँव के लिए यूँ सोचना नहीं पड़ेगा.

    ReplyDelete
  33. sir baton hi baton me aapne bahut hi jyada gahri bat kah di......dil ko chu gayi yah rachna kisi din copy karke apne bhai ko send karugi.......:-)

    ReplyDelete