Monday, July 23, 2012

शब्द क्यों गुम हो गये

छा गयी मन में उदासी,
भाव क्यों मृत हो गये.
लेखनी भी थक गयी है,
शब्द क्यों गुम हो गये.


अश्क कोरों पर थमे हैं,
नयन देते न विदाई.
नेह चुकता जा रहा पर
आस की लौ बुझ न पायी.


देहरी थक कर खड़ी है,
पर कदम गुम हो गये.


चांदनी सी शुभ्र चादर
एक सलवट को तरसती.
मिलन का वादा नहीं था
आँख पर पथ से न हटती.


मौन हो पाया मुखर न, 
पर बयन क्यों खो गये.


मोड़ हमने खुद चुना था
राह सीधी छोड़ कर.
आज पीछे झांकते जब
कोई आता न नज़र.


दोष न प्रारब्ध का था,
हम ही खुद में खो गये.


कैलाश शर्मा 

46 comments:

  1. बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा पढने को मिला |

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  2. मोड़ हमने खुद चुना था
    राह सीधी छोड़ कर.
    आज पीछे झांकते जब
    कोई आता न नज़र....

    जब राह स्वयं ही चुनी है तो किसी की प्रतीक्षा भी क्यों हो ...
    बहुत लाजवाब काहव है पर आज कुछ उदासी की छाया लिए है ...

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  3. बहुत ही खूबसूरती से सजी हुई बेहतरीन ग़ज़ल.

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  4. मोड़ हमने खुद चुना था
    राह सीधी छोड़ कर.
    आज पीछे झांकते जब
    कोई आता न नज़र.,,,

    बहुत बढ़िया प्रस्तुती, आपकी रचना अच्छी लगी ,,,,,बधाई

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: आदर्शवादी नेता,

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  5. मोड़ हमने खुद चुना था
    राह सीधी छोड़ कर.
    आज पीछे झांकते जब
    कोई आता न नज़र... yahi hai moh ka ant

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  6. वाह: कैलाश जी बहुत खुबसूरत रचना..बधाई

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  7. मौन हो पाया मुखर न,
    पर बयन क्यों खो गये.bahut sundar ..

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  8. bahut sundar .......jab ham khud hi mod mud jaten to bhi mud kar dekhne ko jee to chahta hai......

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  9. बहुत सुन्दर लगी पोस्ट।

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  10. देहरी थक कर खड़ी है,
    पर कदम गुम हो गये.
    भावमय करते शब्‍द ...

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  11. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल २४/७/१२ मंगल वार को चर्चा मंच पर चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आप सादर आमंत्रित हैं

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  12. वाह....
    बहुत सुन्दर...
    बेहतरीन भावाव्यक्ति...
    सादर
    अनु

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  13. bahoot khub..dosh na prarabdh ka hai
    hum hi khud mai kho gaye.,
    waah. ,kitni saralta hai in shabdo mai.
    padhkar man udas ho k bhi fir se kuch dhundne lagta hai

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  14. अश्क कोरों पर थमे हैं,
    नयन देते न विदाई.
    नेह चुकता जा रहा पर
    आस की लौ बुझ न पायी.

    बहुत भावपूर्ण रचना !!!

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  15. बहुत बढ़िया प्रस्तुती, रचना अच्छी लगी ,बधाई...........

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  16. Aapke shabd to gum nahee hue hain!

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  17. शब्दों का गुम होना एक विकट परिस्थिति है.आपने इसे अपने शब्दों से बयान की है !

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  18. बहुत सुन्दर
    बेहतरीन भावाभिव्यक्ति...
    :-)

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  19. देहरी थक कर खड़ी है,
    पर कदम गुम हो गये

    Great Lines.. Loved them.

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  20. wah bahut sunder bhav......

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  21. आस रहेगी, शब्द राह तकते ही होंगे..

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  22. बेहतरीन भावाभिव्यक्ति...

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  23. दोष न प्रारब्ध का था,
    हम ही खुद में खो गये.

    कैलाश जी यही कुछ मेरे साथ भी हो रहा है .... बहुत सुंदर प्रस्तुति ....

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  24. सार्थक बात कही है आपने .आभार

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  25. मौन हो पाया मुखर न,
    पर बयन क्यों खो गये.

    बढ़िया नवगीत

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  26. उदास करती बड़ी उत्कृष्ट प्रस्तुति शब्दों को बैसाखी लगे तो आगे क्या हो ?

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  27. अश्क कोरों पर थमे हैं,
    नयन देते न विदाई.
    नेह चुकता जा रहा पर
    आस की लौ बुझ न पायी.
    .. बहुत सुन्दर...

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  28. शब्द निकल तो रहें हैं
    खूबसूरत से बहुत
    कहाँ गुम हुऎ हैं
    इतना कुछ कह गये आप
    फिर ऎसा कैसे कह रहे हैं!!!

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  29. जब मोड़ स्वयं चुना तो प्रारब्ध का दोष क्या !
    कभी यह भी सही लगता है !

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  30. बहुत बढ़िया भाव ।

    आकर्षक प्रस्तुति ।।

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  31. बहुत भावपूर्ण दिल से निकली हुई रचना...

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  32. मोड़ हमने खुद चुना था
    राह सीधी छोड़ कर.
    आज पीछे झांकते जब
    कोई आता न नज़र.
    दोष न प्रारब्ध का था,
    हम ही खुद में खो गये.वाह सर बहुत खूब सार्थक भावभिव्यक्ति...

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  33. वाह बेहद भावप्रवण रचना

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  34. SAHAJ BHAVABHIKTI KE LIYE BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA KAILASH JI

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  35. SAHAJ BHAVABHIVYAKTI KE LIYE AAPKO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA .

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  36. छा गयी मन में उदासी,
    भाव क्यों मृत हो गये.
    लेखनी भी थक गयी है,
    शब्द क्यों गुम हो गये
    अनुभूतियों की चादर से आच्छादित कर देती यह रचना अंतस को .गहरी विछोह वेदना से उपजी पीर लिए है रचना निस्संग रूक्ष परिवेश से रुष्ट भी .

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  37. छा गयी मन में उदासी,
    भाव क्यों मृत हो गये.
    लेखनी भी थक गयी है,
    शब्द क्यों गुम हो गये.....सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  38. bhawpoorna wa adwitiya rachana

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  39. हम ही खुद मे गुम हो गये --- सुन्दर रचना। बधाई।

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  40. शब्द-शब्द बहुत कुछ कह रहा है..जब गुम हो तो और कितना कहेगा..

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  41. बहुत गहन भाव...

    दोष न प्रारब्ध का था,
    हम ही खुद में खो गये.

    भावपूर्ण रचना के लिए बधाई.

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