Friday, August 03, 2012

तलाश एक मोड़ की

             (१)
चुभने लगती जब आँखों में 
सुदूर सितारों की रोशनी भी,
हर सीधी राह भी 
जगा देती एक डर 
भटक जाने का,
रिश्तों की हर डोर 
जब हो जाती कमज़ोर
बार बार टूटने 
और गाँठ लगने से.


तब चाहती ज़िंदगी
एक ऐसा अनज़ान मोड़ 
न हो जिसकी कोई मंज़िल,
जो छुपा ले अस्तित्व 
और मन का अँधियारा
किसी गहन अँधेरे कोने में. 


             (२)
क्यों हो जाती हैं राहें
शामिल वक़्त की साजिश में
और भटका देती हैं राही
किसी न किसी मोड़ पर.


कंक्रीट के ज़ंगल में 
ढूँढता है अपना अस्तित्व 
और अपनी आवाज़
जो खोगयी कोलाहल में मौन के,
न जाने किस मोड़ पर. 



कैलाश शर्मा 

34 comments:

  1. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  2. वाह...
    गहन अभिव्यक्ति....

    सादर
    अनु

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  3. क्यों हो जाती हैं राहें
    शामिल वक़्त की साजिश में
    और भटका देती हैं राही
    किसी न किसी मोड़ पर.
    वक्त्5 भी इम्तिहान लेता है। अच्छी रचना।

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  4. (२)
    क्यों हो जाती हैं राहें
    शामिल वक़्त की साजिश में
    और भटका देती हैं राही
    किसी न किसी मोड़ पर.
    वाह:गहन भाव लिए सुन्दर प्रस्तुति..

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  5. कंक्रीट के ज़ंगल में
    ढूँढता है अपना अस्तित्व

    खुबसूरत अभिवयक्ति.

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  6. जब जानी पहचानी राहें डराती हैं, मन आवारा हो जाता है।

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  7. रिश्तों की हर डोर
    जब हो जाती कमज़ोर
    बार बार टूटने
    और गाँठ लगने से .... !

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  8. वाह ... बेहतरीन

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  9. क्यों हो जाती हैं राहें
    शामिल वक़्त की साजिश में
    और भटका देती हैं राही
    किसी न किसी मोड़ पर... गहरी सोच

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  10. waah bahut sundar ek se badhkar ek badhai aapko

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  11. बढ़िया रचना |
    आभार सर जी ||

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  12. आदरणीय कैलाश सर बेहद खुबसूरत रचना, बहुत-२ बधाई स्वीकार करें.

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  13. खूबसूरत क्षणिकायेँ सर....
    सादर।

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  14. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।बधाई स्वीकारें।

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  15. तलाश है तो वक़्त की साजिश भी कुबूल है..बहुत सुन्दर..

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  16. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (04-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  17. क्यों हो जाती हैं राहें
    शामिल वक़्त की साजिश में

    Great lines.. hoping to see some more. keep writing.

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  18. जिंदगी में ऐसे समय भी आते हैं कभी कभी
    कहते हैं ना की जिंदगी इम्तिहान लेती है ...
    सुंदर प्रस्तुति !
    सादर !

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  19. जो खो गयी कोलाहल में मौन के,
    न जाने किस मोड़ पर,,,,,

    बहुत बेहतरीन सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई,,,,कैलाश जी,,,

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: रक्षा का बंधन,,,,

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  20. रिश्तों की कमजोर होती डोर एक अनजान अंधरे मोड़ पर ले जाती है जिंदगी !
    आवारापन , बंजारापन जैसी गूँज है इन कविताओं में !

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  21. वाह ...बहुत सुन्दर..........

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  22. कंक्रीट के ज़ंगल में
    ढूँढता है अपना अस्तित्व
    और अपनी आवाज़
    जो खोगयी कोलाहल में मौन के,
    न जाने किस मोड़ पर. ..

    जीवन की यही रीत रहती है ... उम्र के किसी न किसी पढाव पे ऐसे हालात आ ही जाते हैं ... दोष .... शायद ओपन ही रहता हो ..

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  23. जीवन कई रूपों में सामने आता है..कभी सब कुछ स्पष्ट होता है कभी भ्रम के बादल राहों को छिपा लेते हैं...बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता..

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  24. गहन अभिव्यक्ति

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  25. ज़िन्दगी की तलाश में भटकती ज़िन्दगी... सुन्दर रचना, बधाई.

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  26. जिंदगी की तलाश महानगर में आज हर किसी को है ।
    सुंदर कविता ।

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  27. क्यों हो जाती हैं राहें
    शामिल वक़्त की साजिश में
    और भटका देती हैं राही
    किसी न किसी मोड़ पर.
    Aah!

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  28. कंक्रीट के ज़ंगल में
    ढूँढता है अपना अस्तित्व
    और अपनी आवाज़
    जो खोगयी कोलाहल में मौन के,
    न जाने किस मोड़ पर.

    बहुत सुंदर कैलाश जी.

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  29. Sir, BEJOR hai, main aapki pransansa karna chahta hu lekin aapne muje nishabd kar diya.

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