Thursday, May 09, 2013

अहसासों का जंगल


अहसासों के सूने जंगल में
ढूंढ रहा वे अहसास
जो हो गये गुम जीवन में
जाने किस मोड़ पर.

हर क़दम पर चुभती हैं
किरचें टूटे अहसासों की,
सहेज कर जिनको उठा लेता,
शायद कभी मिल जायें
सभी टूटे टुकड़े
और जुड़ जाये फिर से
टूटे अहसासों का आईना.

बेशक़ होंगे निशान
हरेक जोड़ पर
और न होगी वह गर्मी 
उन अहसासों में,
लेकिन कुछ तो भरेगा शून्य
अंतस के सूनेपन का.

काश जान पाता दर्द
टूटे अहसासों का,
नहीं लगाता आँगन में
पौधे कोमल अहसासों के.

...कैलाश शर्मा 

35 comments:

  1. जीवन के शून्य को भारती ... उसकी चाह में जीती ... सुन्दर रचना ...

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  2. बहुत ही बेहतरीन और उम्दा प्रस्तुति,आभार.

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  3. सच्चाई को समर्पित सुन्दर रचना

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  4. बहुत विचारणीय बात कह दी आपने इस अहसास वाली कविता से। ये हम सब के साथ हो रहा है कि हम चाह कर भी घर, समाज और परिवेश के संवेदनशील प्राणियों को वह प्रेम नहीं दे पा रहे हैं, जो दिया जाना चाहिए। मात्र प्रेम देने का अहसास लेके घूम रहे हैं। तब पछतावे के अतिरिक्‍त कुछ नहीं होता हमारे पास जब हमें लगता है कि चाहे गए रास्‍ते पर नहीं चल कर हम कहीं और ही भटक रहे हैं।

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  5. काश जान पाता दर्द
    टूटे अहसासों का,
    नहीं लगाता आँगन में
    पौधे कोमल अहसासों के.……………हम ये सच जानते हुये भीलगा देते हैं कोमल पौधे अहसासों के और दर्द में डूबने के लिये

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  6. काश जान पाता दर्द
    टूटे अहसासों का,
    नहीं लगाता आँगन में
    पौधे कोमल अहसासों के.
    बिलकुल सच्ची बात
    खुबसूरत अभिव्यक्ति

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  7. जीवन से जुड़ी रचना ....संवेदनशील भाव

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  8. लाजवाब भावभिव्यक्ति ...

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  9. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति..

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  10. लेकिन कुछ तो भरेगा शून्य
    अंतस के सूनेपन का.bahut khoob .....mere dil ki bhi bat kah dee .....dhanyavad ....

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  11. बेहतरीन प्रस्तुति

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-05-2013) के "मेरी विवशता" (चर्चा मंच-1240) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  13. बढियां रचना! बधाइयाँ!

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  14. संवेदनशील प्रस्तुति ,सुन्दर रचना!

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  15. कौन लगाता है ये कोमल एहसासों के पौधे...
    ये तो खुद-ब-खुद पनप आते हैं दिलों में..

    सुन्दर!!!!

    अनु

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  16. संवेदनशील रचना

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  17. टूटे अहसासों की पूर्ति ,बहुत अच्छा प्रस्तुति !

    latest post'वनफूल'
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  18. काश जान पाता दर्द
    टूटे अहसासों का,
    नहीं लगाता आँगन में
    पौधे कोमल अहसासों के.

    सच ... मन को छूती प्रस्‍तुति

    सादर

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  19. बहुत ही बढ़िया अंकल


    सादर

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  20. काश जान पाता दर्द
    टूटे अहसासों का,
    नहीं लगाता आँगन में
    पौधे कोमल अहसासों के.....बहुत सुन्दर

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  21. बहुत खुबसूरत रचना.. सुंदर अभिव्यति!!

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  22. बहु८त ही मार्मिक रचना है !

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  23. बहुत सुन्दर रचना

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  24. जीवन में अहसास ही तो नहीं मिलते ...बाकि सब मिल जाता है

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  25. हर घटना एक स्मृति छोड़ जाती है..कुछ अच्छी, कुछ व्यथित करती।

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  26. काश जान पाता दर्द
    टूटे अहसासों का,
    नहीं लगाता आँगन में
    पौधे कोमल अहसासों के.------
    संवेदना के पौधे भी वर्तमान में सूख जाते हैं
    सुंदर अहसास की रचना
    बधाई

    आग्रह है पढ़े "अम्मा"

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  27. बेशक़ होंगे निशान
    हरेक जोड़ पर
    और न होगी वह गर्मी
    उन अहसासों में,
    लेकिन कुछ तो भरेगा शून्य
    अंतस के सूनेपन का....
    वाह ! बहुत बेहतरीन भावों से सँजोया है आपने।

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  28. बहुत सुन्दर और गहन..........

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