Thursday, January 12, 2012

नयन ताकते रहे

बात जब तेरी उठी
दर्द हो गये हरे,
हो गये बयन निशब्द
नयन ताकते रहे.


थे तिरोहित कर दिये
नयन के सब अश्रु जल,
वक़्त की चादर तले
ढक दिये सब बीते पल.


रंग मेहंदी देख कर 
कसक अंतस में जगी,
याद भी गहरा गयी 
स्वप्न सालते रहे.


चाँद था आकाश में
चांदनी गुमसुम मगर.
था उजाला व्योम में
पर अंधेरी थी डगर.


दूर दीपक देख कर 
आस फिर से जग गयी,
आस की धूमिल किरण
तिमिर ढांकते रहे.


मंजिल नहीं हर राह की,
कुछ राह हैं अंधी गली.
सब मोड़ हैं अनजान से,
लेजायें जाने किस गली.


नयन में सागर उठा
डूब साहिल भी गया,
चीथड़े टुकड़ों में हम
स्वप्न बांधते रहे.


कैलाश शर्मा

74 comments:

  1. चाँद था आकाश में
    चांदनी गुमसुम मगर.
    था उजाला व्योम में
    पर अंधेरी थी डगर.

    behtareen abhivyaktiyon ka guchchaa hai kavita

    ReplyDelete
  2. थे तिरोहित कर दिये
    नयन के सब अश्रु जल,
    वक़्त की चादर तले
    ढक दिये सब बीते पल.
    waah kya baat hai!!!! uncle bahut khub likha hai aapne shaandaar prastuti ....

    ReplyDelete
  3. मंजिल नहीं हर राह की,
    कुछ राह हैं अंधी गली.
    सब मोड़ हैं अनजान से,
    लेजायें जाने किस गली.

    .......सुन्दर प्रस्तुति|

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति

      शुक्रवारीय चर्चा मंच पर

      charchamanch.blogspot.com

      Delete
  4. वाह...
    बहुत ही सुन्दर रचना..
    सादर.

    ReplyDelete
  5. रंग मेहंदी देख कर
    कसक अंतस में जगी,
    याद भी गहरा गयी
    स्वप्न सालते रहे...गहन भाव

    ReplyDelete
  6. चाँद था आकाश में
    चांदनी गुमसुम मगर.
    था उजाला व्योम में
    पर अंधेरी थी डगर....

    सरल शब्दों में लय में बंधी उत्तम रचना ...

    ReplyDelete
  7. सुन्दर कविता...बहुत बढ़िया... अंतिम पंक्तिया दिल को छू रही हैं..

    ReplyDelete
  8. सुन्दर कविता...बहुत बढ़िया... अंतिम पंक्तिया दिल को छू रही हैं..

    ReplyDelete
  9. वक़्त की चादर तले
    ढक दिये सब बीते पल...
    बहुत अच्छी रचना... आभार

    ReplyDelete
  10. रंग मेहंदी देख कर
    कसक अंतस में जगी,
    याद भी गहरा गयी
    स्वप्न सालते रहे.

    खूबसूरत अभिव्यक्ति!!

    ReplyDelete
  11. स्वप्न बांधते रहे और आस की धूमिल किरणों से भरते रहे..अच्छी लगी..

    ReplyDelete
  12. आपको लोहड़ी की हार्दिक शुभ कामनाएँ।
    ----------------------------
    कल 13/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  13. Replies
    1. मंजिल नहीं हर राह की,
      कुछ राह हैं अंधी गली.
      सब मोड़ हैं अनजान से,
      लेजायें जाने किस गली.


      नयन में सागर उठा
      डूब साहिल भी गया,
      चीथड़े टुकड़ों में हम
      स्वप्न बांधते रहे.
      Behad sundar!

      Delete
  14. बात जब तेरी उठी
    दर्द हो गये हरे,
    हो गये बयन निशब्द
    नयन ताकते रहे....बहुत सुन्दर ..हम भी निशब्द होगए..

    ReplyDelete
  15. अद्भुत अभिव्यक्ति, बस निशब्द हो पढ़ रहे हैं।

    ReplyDelete
  16. थे तिरोहित कर दिये
    नयन के सब अश्रु जल,
    वक़्त की चादर तले
    ढक दिये सब बीते पल.
    ....बहुत सुन्दर गहन भावभिव्यक्ति !

    ReplyDelete
  17. रंग मेहंदी देख कर
    कसक अंतस में जगी,
    याद भी गहरा गयी
    स्वप्न सालते रहे.

    "स्वप्न झरे फूल से मीत चुभे शूल से..." वाह आपकी पंक्तियों से नीरज जी याद आ गए...बहुत सुन्दर रचना..बधाई

    नीरज

    ReplyDelete
    Replies
    1. श्रद्देय नीरज जी प्रारंभ से मेरे बहुत प्रिय कवि रहे हैं और उनकी रचनायें पढ़ और सुन कर बड़ा हुआ हूँ. लेकिन मैं उनकी रचनाओं की श्रेष्ठता के करीब पहुँचने की स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकता. आपको मेरी रचना पसन्द आयी, इसके लिये आभार.

      Delete
  18. चाँद था आकाश में
    चांदनी गुमसुम मगर.
    था उजाला व्योम में
    पर अंधेरी थी डगर.

    मन के भावों को खूबसूरती से लिखा है

    ReplyDelete
  19. चाँद था आकाश में
    चांदनी गुमसुम मगर.
    था उजाला व्योम में
    पर अंधेरी थी डगर.

    मन के भावों को खूबसूरती से लिखा है

    ReplyDelete
  20. बात जब तेरी उठी
    दर्द हो गये हरे,
    हो गये बयन निशब्द
    नयन ताकते रहे.

    bahut sundar....bhav purn

    ReplyDelete
  21. सुन्दर रचना, ख़ूबसूरत भावाभिव्यक्ति,बधाई.

    ReplyDelete
  22. नयन में सागर उठा
    डूब साहिल भी गया,
    चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.
    laajwaab.....

    ReplyDelete
  23. बात जब तेरी उठी
    दर्द हो गये हरे,
    हो गये बयन निशब्द
    नयन ताकते रहे.

    बहुत ही प्रभावी सम्प्रेषण.

    ReplyDelete
  24. सुन्दर शब्दावली, सुन्दर अभिव्यक्ति.

    ReplyDelete
  25. गहरे जज्‍बात।
    सुंदर प्रस्‍तुतिकरण।

    ReplyDelete
  26. नयन ताकते रहे, स्वप्न बांधते रहे ...
    बहुत सुन्दर!

    ReplyDelete
  27. my heartfelt thanks for your motivation dear Kailash Sharmaji..and please do write more superb poems..u r a 'mahaan kavi'..God love u..

    ReplyDelete
  28. बहुत भावपूर्ण कविता .

    'चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.'
    अर्थपूर्ण एवं चित्रात्मक प्रयोग !

    ReplyDelete
  29. बहुत ही खूबसूरत रचना...

    ReplyDelete
  30. बहुत सुंदर प्रेम गीत...

    ReplyDelete
  31. बेबसी ,इंतज़ार और बेकरारी का आलम ही कुछ ऐसा बंधा ...कि शब्दों से रची रचना बेहद खूबसूरत बन गई ...

    ReplyDelete
  32. एहसास का सुन्दर स्वर
    प्रकृति उपालंभ

    ReplyDelete
  33. स्नेहसिक्त रचना

    ReplyDelete
  34. बात जब तेरी उठी
    दर्द हो गये हरे,
    हो गये बयन निशब्द
    नयन ताकते रहे.excellent.

    ReplyDelete
  35. मंजिल नहीं हर राह की,
    कुछ राह हैं अंधी गली.
    सब मोड़ हैं अनजान से,
    लेजायें जाने किस गली.

    वाह ...सुन्दर पंक्तियाँ

    ReplyDelete
  36. बहुत अच्छी रचना,अंतिम ४ पंक्तियाँ सुंदर लगी,बेहतरीन ,...
    नई रचना-काव्यान्जलि--हमदर्द-

    ReplyDelete
  37. बहुत ही उत्तम रचना, बधाई।

    ReplyDelete
  38. सुंदर ..गुनगुनाने लायक ...
    शुभकामनायें आपको !

    ReplyDelete
  39. सुंदर शब्द रचना , सुंदर भावाभिव्यक्ती ...
    अति सुंदर रचना...

    ReplyDelete
  40. नयन में सागर उठा
    डूब साहिल भी गया,
    चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.
    वाह अद्भुत भाव। आभार व मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  41. निशब्द करती खूबसूरत रचना.

    सादर.

    ReplyDelete
  42. मंजिल नहीं हर राह की,
    कुछ राह हैं अंधी गली.
    सब मोड़ हैं अनजान से,
    लेजायें जाने किस गली.

    ..............NAMASKAR KAILASH JI . BAHUT SUNDER TAKTE NAYEN .ABHAR SUNDER RACHNA KE LIYE

    ReplyDelete
  43. नयन में सागर उठा
    डूब साहिल भी गया,
    चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.

    एहसासों की सुंदर अभिव्यक्ति. एक और खूबसूरत प्रस्तुति. बधाई कैलाश जी.

    ReplyDelete
  44. बहुत ही उत्तम रचना|मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  45. भावविह्वल करती श्रेष्ठ रचना .
    चाँद था आकाश में
    चांदनी गुमसुम मगर.
    था उजाला व्योम में
    पर अंधेरी थी डगर.

    ReplyDelete
  46. मंजिल नहीं हर राह की,
    कुछ राह हैं अंधी गली.
    सब मोड़ हैं अनजान से,
    लेजायें जाने किस गली.

    उम्दा...
    आपने बहुत ही खूबसूरती से संजोया है इन शब्दों को...

    मेरे ब्लॉग पर आपका सादर आमन्त्रित करता हूँ...

    ReplyDelete
  47. मंजिल नहीं हर राह की,
    कुछ राह हैं अंधी गली.
    सब मोड़ हैं अनजान से,
    लेजायें जाने किस गली.


    नयन में सागर उठा
    डूब साहिल भी गया,
    चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.

    BAHUT HI SUNDAR KRITI LAGI BILKUL SANGRAHNEEY RACHANA ....NEERAJ JI KI RACHANA SE BHI GAMBHIR ......BADHAI

    ReplyDelete
  48. कोमल भावों को सहेजता सुंदर गीत।

    ReplyDelete
  49. आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (२६) मैं शामिल की गई है /आप मंच पर आइये और अपने अनमोल सन्देश देकर हमारा उत्साह बढाइये /आप हिंदी की सेवा इसी मेहनत और लगन से करते रहें यही कामना है /आभार /लिंक है
    http://www.hbfint.blogspot.com/2012/01/26-dargah-shaikh-saleem-chishti.html

    ReplyDelete
  50. सुंदर भावाभिव्यक्ती ...

    ReplyDelete
  51. गहन भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    ReplyDelete
  52. चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.

    एहसासों की... खूबसूरत प्रस्तुति बेहतरीन रचना के लिए आभार

    ReplyDelete
  53. चाँद था आकाश में
    चांदनी गुमसुम मगर.
    था उजाला व्योम में
    पर अंधेरी थी डगर.....vaah...laajabaab..bahut khoobsurat rachna.padhne me thodi der ho gai maaf kijiyega.

    ReplyDelete
  54. kailash ji..bahut sundar likha hain aapne.

    ReplyDelete
  55. बेहद खूबसूरत और भावपूर्ण प्रस्तुति है आपकी.
    पढकर दिल भावविभोर हो गया है.

    प्रस्तुति के लिए आभार,कैलाश जी.

    ReplyDelete
  56. नयन में सागर उठा
    डूब साहिल भी गया,
    चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.

    बहुत सुन्दर सर...
    सादर बधाई.

    ReplyDelete
  57. नयन में सागर उठा
    डूब साहिल भी गया,
    चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.

    बहुत बढ़िया गीत

    ReplyDelete
  58. रंग मेहंदी देख कर
    कसक अंतस में जगी,
    याद भी गहरा गयी
    स्वप्न सालते रहे.
    गहन भाव ....बहुत सुंदर रचना ....

    ReplyDelete
  59. दूर दीपक देख कर
    आस फिर से जग गयी,
    आस की धूमिल किरण
    तिमिर ढांकते रहे.
    ये आस कभी टूटे ना...भावपूर्ण रचना...

    ReplyDelete
  60. मंजिल नहीं हर राह की,
    कुछ राह हैं अंधी गली.
    सब मोड़ हैं अनजान से,
    लेजायें जाने किस ग....aiseee sthiti utpann ho hee jaati hai...jandagi ke sangharsh aaur us darmyan uthi manah sthiti ka behtarin chitran...aapki ye chaar chaar laiyine cricket ke chauke kee tarah hai..ran bhee badhate hain aaur har bhar ontho se niklata hai wah...kamal hai..sadar badhayee aaur amantran ke sath

    ReplyDelete
  61. खूबसूरत !

    दर्द तू बस हरा ही
    क्यों है होता
    दर्द अगर इंद्रधनुष होता
    सात रंग देखता आदमी
    दर्द कुछ भूलता
    खुश कुछ तो होता !

    ReplyDelete
  62. मंजिल नहीं हर राह की,
    कुछ राह हैं अंधी गली.
    सब मोड़ हैं अनजान से,
    ले जायें जाने किस गली.

    नयन में सागर उठा
    डूब साहिल भी गया,
    चीथड़े टुकड़ों में हम
    स्वप्न बांधते रहे.

    बहुत सुंदर रचना

    ReplyDelete