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Thursday, September 14, 2017

दर्द को आशियां मिला

दर्द को आशियां मिला,
मिरे घर का निशां मिला.

तू न मेरा नसीब था,
दर्द का साथ तो मिला.

रात भर जागते रहे,
सुबह खाली मकां मिला.

ज़िंदगी इस तरह रही,
हर किसी को रहा गिला.

चंद लम्हे खुशी मिली,
फिर अँधेरा घना मिला।

...©कैलाश शर्मा

Saturday, November 02, 2013

किसी देहरी आज अँधेरा न रहने दें

किसी देहरी आज अँधेरा न रहने दें,
आओ बस्ती झोपड़ियों में दीप जलाएं।

अपनों के तो लिये सजाये कितने सपने,
सोचा नहीं कभी उनका जिनके न अपने,
भूखे पेट गुज़र जाती हर रातें जिनकी,
चल कर के उनमें भी एक आस जगाएं।

बना रहे हैं जो दीपक औरों की खातिर,
उनके घर में आज अँधेरा कितना गहरा,
बिजली की जगमग में दीपक पड़े किनारे,
इंतज़ार सूनी आँखों में, दीपक बिक जाएँ।

महलों की जगमग चुभने लगती आँखों में,
अगर अँधेरा रहे एक भी घर में बस्ती के,
लक्ष्मी नहीं है घटती गर दुखियों में बाँटें,
सूखे होठों पर कुछ पल को मुस्कानें लाएं।

जब तक जगमग न हो घर का हर कोना,
अर्थ नहीं कोई, एक कोने में दीप जलाएं.

**दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें**


....कैलाश शर्मा