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Thursday, September 14, 2017
दर्द को आशियां मिला
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Kailash Sharma,
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निशां
Tuesday, June 04, 2013
सुबह ढूंढेंगे फ़िर सपने, अभी तो शाम ढलती है
इन हथेली की लकीरों से, कहाँ तक़दीर बनती है,
मुसाफ़िर ही सदा चलते, कभी मंज़िल न चलती है.
चलो अब घर चलें, सुनसान कोने राह तकते हैं,
सुबह ढूंढेंगे फ़िर सपने, अभी तो शाम ढलती है.
यकीं है आख़िरी पल तक, वो इक बार आयेंगे,
रुको कुछ देर तो यारो, अभी तो साँस चलती है.
उठे न उंगलियां तुम पर, यही कोशिश रही अपनी,
शिकायत क्या करें उससे, जो गुनहगार कहती है.
रवायत इश्क़ की तेरी, समझ पाया न ये दिल है,
नहीं अब वक़्त भी बाक़ी, घड़ी की सुई चलती है.
कि देने छांव रिश्तों को, बनाया आशियां हमने,
दीवारें हो गयीं ज़र्ज़र, कि छत भी अब टपकती है.
....कैलाश शर्मा
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हथेली
Tuesday, February 26, 2013
ठहरा हुआ वक़्त
मिल जाता
चंद
लम्हों का अहसास
तुम्हारे
साथ होने का,
गुनगुनाता
तुम्हारे गीत
मेरा
आशियाँ आज भी.
******
ख्वाबों का आशियाँ
अब भी है
बेताब
रात की
तन्हाई में
सुनने को
एक आहट
तुम्हारे कदमों की.
******
अश्क़ भी हैं भूल गए
नयनों से
गिरना,
रह गयीं
सूखी लक़ीरें
तप्त
कपोलों पर
तुम्हारे
इंतज़ार में.
******
मिल जाते पंख
भरने लगता उड़ान
ठहरा हुआ वक़्त,
पाकर तुम्हारा साथ
कुछ पल को.
******
क्यूँ
दिखाए सपने
खुली
आँखों से
ग़र तोड़ना
ही था,
मेरी वफ़ा
का बाँध
बहने भी
नहीं देता
इन्हें
अश्क़ों के साथ.
******
मिल जाते पंख
भरने लगता उड़ान
ठहरा हुआ वक़्त,
पाकर तुम्हारा साथ
कुछ पल को.
कैलाश शर्मा
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