मैंने सब द्वार खुले रखे थे अपने घर के,
बंद दर देख के खुशियाँ न कहीं मुड़ जायें.
थक गयी चौखटें सुनसान डगर तकते हुए,
बंद करती नहीं पलकें कि नज़र आजायें.
कितना आसान निकल जाना चुरा कर नज़रें,
तुमको क्या इल्म जो गुज़री है किसी के दिल पर.
इतना डर था जो ज़माने की नज़र का तुमको,
मुस्करा कर क्यों उठाई थी ये नज़रें मुझ पर.
अब न शिकवा,न शिकायत,न कोई गम है,
चन्द लम्हे ही बहुत हैं जो तेरे साथ कटे.
देके उम्मीद बदल जाना कसक देता है,
वर्ना मुश्किल नहीं जो उम्र अकेले ही कटे.




