Monday, February 13, 2012

क्या वह प्रेम नहीं था ?

समझते रहे 
एक दूसरे की चाहत
कहने से पहले ही,
उठा लिया पलकों से
एक दूसरे का गम
बिना कुछ कहे,
परिवार की हर खुशी
बनाली अपनी
और बन गये कन्धा 
एक दूसरे के गम में.

ज़िंदगी की जद्दोज़हद
और भाग दौड़ ने
फंसाये रखा
अपने मकडजाल में,
नहीं गये कभी
केंडल डिनर पर,
हाथों में हाथ ड़ाल कर 
नहीं घूमे सागर तट पर,
नहीं किया इज़हार
कभी शब्दों में प्यार
और न दिया कभी 
लाल गुलाब.

जीवन के इस मोड़ पर
क्यों उठा यह प्रश्न 
क्या उनका प्रेम,
जो सदैव रहा मौन
और नहीं था इंतज़ार
जिसे अभिव्यक्ति का,
प्रेम नहीं था ?


कैलाश शर्मा 

52 comments:

  1. प्रेम सच्चा है तो इस तरह अपना हिस्सा होता है कि अव्यक्त ही रह जाता है...!
    सुन्दर भाव!
    *क्या उनका प्रेम,
    जो सदैव रहा मौन
    और नहीं था इंतज़ार
    जिसे अभिव्यक्ति का,
    प्रेम नहीं था ?*
    वही प्रेम था!
    Regards,

    ReplyDelete
  2. वही सच्चा प्रेम था जिसे अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं थी...
    सादर

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुंदर एवं सार्थक भाव संयोजन ...मेरा तो यह मानना है की प्यार सिर्फ प्यार होता है फिर वो क्षणिक हो या अनंत अपार... मौन हो या कह दिया गया हो। प्यार तो बस प्यार है।

    ReplyDelete
  4. बिलकुल था और सच कहें तो यही प्रेम है जो मौन में अभिव्यक्त है.....बहुत सुन्दर पोस्ट है ।

    ReplyDelete
  5. अनुपम भाव संयोजन के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    ReplyDelete
  6. अनुपम भाव संयोजन लिए हुए ...बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    ReplyDelete
  7. बहुत सही कहा..सुन्दर अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  8. बहुत सुन्दर ,

    जिद्दोजहद को जद्दोजहद कर दीजिये !

    ReplyDelete
  9. वही तो प्रेम है....
    २० रुपये का एक गुलाब दिया तो प्रेम हुआ क्या???

    सुन्दर रचना..

    ReplyDelete
  10. बातो हो बातों में आपने सबकुछ कह दी

    ReplyDelete
  11. जीवन के इस मोड़ पर
    क्यों उठा यह प्रश्न
    क्या उनका प्रेम,
    जो सदैव रहा मौन
    और नहीं था इंतज़ार
    जिसे अभिव्यक्ति का,
    प्रेम नहीं था ?
    .... bahut hi gahri baat

    ReplyDelete
  12. प्रेम को कहना नहीं पड़ता ... बस वो होता है ... एक दूसरे के लिए समर्पित ...सुंदर रचना

    ReplyDelete
  13. बहुत सुन्दर |
    बधाई ||

    ReplyDelete
  14. सच्चा प्रेम अभिव्यक्ति की बात कब जोहता है? वह तो बस अभिव्यक्त हो जाता है....
    सुन्दर रचना...
    सादर...

    ReplyDelete
  15. जीवन के इस मोड़ पर
    क्यों उठा यह प्रश्न
    क्या उनका प्रेम,
    जो सदैव रहा मौन
    और नहीं था इंतज़ार
    जिसे अभिव्यक्ति का,
    प्रेम नहीं था ?
    Wo bhee prem hee hota hai! Use kaise nakar sakta hai koyee?

    ReplyDelete
  16. वास्तविक प्रेम का चित्रण, अंतर्मन को झकझोर देने वाली कविता। धन्यवाद!

    ReplyDelete
  17. बड़ी प्यारी कविता है

    ReplyDelete
  18. ये मूक प्रेम था ...बस जीवन की भाग-दौड़ में जताने का समय नही था..
    सच!

    ReplyDelete
  19. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति,बधाई ||

    ReplyDelete
  20. एक दूसरे की चाहत
    कहने से पहले ही,
    उठा लिया पलकों से
    एक दूसरे का गम
    बिना कुछ कहे,....प्यारी कविता है

    ReplyDelete
  21. pyar ki sunder vyakyha ki hai aapne..........

    ReplyDelete
  22. प्यार की खुबसूरत अभिवयक्ति........

    ReplyDelete
  23. प्रेम को प्रतीकों की क्या आवश्यकता भला..

    ReplyDelete
  24. जी हाँ यही प्रेम था सच्चा प्रेम जिसे व्यक्त करने के लिए किसी गुलाब की आवश्यकता नहीं होती...बहुत सुन्दर भाव... सादर

    ReplyDelete
  25. प्रेम एक बड़ी शक्ति है परन्‍तु पवित्र प्रेम करने के लिए बहुत शक्ति चाहिए।

    ReplyDelete
  26. gazab sirji , gazab..
    behtareen..

    agar sach mein dekha jaaye to isse sachha prem aur koi nahi :)

    palchhin-aditya.blogspot.in

    ReplyDelete
  27. bahut badhiyaa
    dikhaane se prem nahee hotaa

    ReplyDelete
  28. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

    ReplyDelete
  29. जी हाँ वो ही तो प्रेम था..... सुंदर रचना

    ReplyDelete
  30. प्रेम तो स्वयं व्यक्त है उसे अभिव्यक्ति की आवश्यकता तो नहीं

    ReplyDelete
  31. बहुत ही बढ़िया ...

    ReplyDelete
  32. निश्चित यही तो प्रेम था !
    बहुत अच्छी लगी रचना !

    ReplyDelete
  33. निश्चित यही तो प्रेम था !
    बहुत अच्छी लगी रचना !

    ReplyDelete
  34. @ कैलाश जी,
    स्वानुभूत प्रेम को बहुत ही करीने से व्यक्त किया है.
    'प्रेम' व्यक्ति के जीवन में बिखरा हुआ है...उसके प्रत्येक कर्म में, जुड़े हुए संबंधों में, दायित्वों में वह समाविष्ट है... 'प्रेम' के अनेक रूप हैं.... जिसे हम कुशल गृहस्थी और विनम्र संतान दोनों में देख सकते हैं. बड़ों के छोटों के प्रति ममता/ वात्सल्य के भाव; और छोटों के बड़ों के प्रति श्रद्धा और आदर के भाव क्या 'प्रेम' नहीं कहे जाने चाहिए?... प्रेम की अभिव्यक्ति मौन हो अथवा मुखर... प्रेमी (पात्र) को केवल शब्दों की भाषा से ही समझना नहीं आना चाहिए ... उसे कायिक और मानसिक भावाभिव्यक्ति को भी समझना आना चाहिए.
    आपके काव्यमय विचारों ने मेरी सोच को भी अपना अनुयायी बना लिया. आभारी हूँ.

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया प्रतुल जी...

      Delete
  35. प्रेम की अलौकिक परिणीति..

    ReplyDelete
  36. प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति,,,,,

    ReplyDelete
  37. कल 15/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है !
    क्‍या वह प्रेम नहीं था ?

    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  38. प्रेम मौन ही अच्छा लगता हैं ....मन को छु लेने वाले शब्दों के साथ ..भावपूर्ण अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  39. हाँ यही प्यार है,
    बहुत अच्छी रचना,सुंदर प्रस्तुति

    MY NEW POST ...कामयाबी...

    ReplyDelete
  40. "जीवन के इस मोड़ पर
    क्यों उठा यह प्रश्न
    क्या उनका प्रेम,
    जो सदैव रहा मौन
    और नहीं था इंतज़ार
    जिसे अभिव्यक्ति का,
    प्रेम नहीं था ?"

    सही मायने में प्रेम यही है.....
    जो कहा न जाए...
    और सुनने वाला सुन ले,

    ReplyDelete
  41. ये सब टोटके उनके लिए हैं जो प्‍यार करना नहीं जानते।

    ReplyDelete
  42. जीवन के इस मोड़ पर
    क्यों उठा यह प्रश्न
    क्या उनका प्रेम,
    जो सदैव रहा मौन
    और नहीं था इंतज़ार
    जिसे अभिव्यक्ति का,
    प्रेम नहीं था

    bahut behtareen rachna.........

    ReplyDelete
  43. प्रेम तो वही था......
    care and share ..

    ReplyDelete
  44. वास्तव में..... कैलाश जी ,सच्चा प्रेम तो वाही था जो अनकहा रह गया.... बहुत सुन्दर!

    ReplyDelete
  45. जीवन के इस मोड़ पर
    क्यों उठा यह प्रश्न
    क्या उनका प्रेम,
    जो सदैव रहा मौन
    और नहीं था इंतज़ार
    जिसे अभिव्यक्ति का,
    प्रेम नहीं था ?
    Bhav pradhan kavita. Pathkon par amit prabhav chhodti rachna.

    ReplyDelete
  46. aaadarniy kailash ji , vastav me saccha prem wahi hota hai jo apne karam ko karta jata hai ye dekhe bina ki hamne izhar kiya hai athva nahi, bas prem to prem hai ........

    ReplyDelete
  47. सच पूछो तो असली प्रेम यही है ... दिल से दिल तक का प्रेम ...

    ReplyDelete
  48. pyaar gahra hota hai anubhooti ka jisme koi dikhava na ho vahi sachcha prem hai.bahut sundar likha.

    ReplyDelete
  49. sachcha prem abhivyakti ka intajar nahi karta,vah to bas nirantar bahta rahta hai.

    ReplyDelete