मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश:
ग्यारहवाँ अध्याय
(विश्वरूपदर्शन-योग-११.४७-५५)
श्री भगवान:
तुम पर प्रसन्न होकर के अर्जुन
यह परमोत्तम रूप दिखाया.
तेजोमय, अनंत, विश्वरूप यह,
इससे पहले न कभी दिखाया. (११.४७)
न वेदाध्यन स्वाध्याय यज्ञ से,
न कर्मकांड दान व तपश्चर्या से.
नहीं कोई भी यह देख सका है
अतिरिक्त तुम्हारे मृत्युलोक से. (११.४८)
मेरा घोर रूप देख कर अर्जुन
किंकर्तव्यविमूढ़ हो न घबराओ.
फिर से मेरा पहला रूप देख कर
भय को त्याग प्रसन्न हो जाओ. (११.४९)
संजय:
यह कहकर अर्जुन से राजन,
सौम्य रूप कृष्ण दिखलाया.
देने सांत्वना डरे अर्जुन को
सौम्य रूप उसको दिखलाया. (११.५०)
अर्जुन:
देख सौम्य मानुषी रूप को
भगवन मैं प्रसन्न हो गया.
स्वाभाविक स्थिति में अब मैं
मेरा मन है शान्त हो गया. (११.५१)
श्री भगवान:
मेरा विश्वरूप है जो देखा
बहुत कठिन देखना इसका.
करते देव भी हैं आकांक्षा
दर्शन के इस विश्वरूप का. (११.५२)
जैसा रूप है देखा तुमने
वैसा कोई देख न पाता.
न वेदों न तप न दान से
नहीं यज्ञ से देख है पाता. (११.५३)
केवल अनन्यभक्ति के द्वारा,
विश्वरूप में जान है सकता.
अर्जुन जान तत्व यह मुझमें
अभिन्न रूप प्रवेश कर सकता. (११.५४)
करता कर्म निमित्त मेरे ही,
मुझे परम पुरुषार्थ मानता.
वैर भाव आसक्ति रहित जो
मेरा भक्त मुझे है पाता. (११.५५)
**ग्यारहवां अध्याय समाप्त**
.......क्रमशः
कैलाश शर्मा


