पीडाओं के घिर आये घन,
अश्कों में डूब गया अंतर्मन,
फिर भी प्यास नहीं बुझ पायी अंतस के प्यासे मरुथल की.
छोड़ दिया है साथ आज उर के विश्वासों की सीता ने,
सुखा दिये नयनों के आंसू आज सुलगती पीडाओं ने,
अधरों का होता है कम्पन,
अनबूझे रह जाते बंधन,
छली गयी है आज सदा की तरह आस मम अंतस्तल की.
कौन मीत किसका, कलके साथी अनजाने आज बन गये ,
एक क्षणिक अंतर में ही विश्वासों के आधार ढह गये.
था कल तक नयनों में अपना पन,
है आज मगर अनजाना पन,
देख अज़नबीपन नयनों में, ठिठक गयी मुस्कान अधर की.
क्या अधरों की भाषा में ही प्रेम व्यक्त करना होता है,
नयनों की भाषा का भी क्या कोई अर्थ नहीं होता है ,
अनबूझे रह गये निमंत्रण,
इंतज़ार में बीत गये क्षण,
पल भर में निश्वास बन गयी, मम अंतर की आस मिलन की.

