Saturday, August 02, 2014

आवाज़ मौन की

जीवन के अकेलेपन में     
और भी गहन हो जाती
संवेदनशीलता,
होता कभी अहसास
घर के सूनेपन में
किसी के साथ होने का,
शायद होता हो अस्तित्व
सूनेपन का भी.
     ***
शायद हुई आहट           
दस्तक सुनी दरवाज़े पर
पर नहीं था कोई,
गुज़र गयी हवा
रुक कर कुछ पल दर पर,
सुनसान पलों में हो जाते
कान भी कितने तेज़
सुनने लगते आवाज़
हर गुज़रते मौन की.
      ***
आंधियां और तूफ़ान       
आये कई बार आँगन में
पर नहीं ले जा पाये
उड़ाकर अपने साथ,
आज भी बिखरे हैं
आँगन में पीले पात
बीते पल की यादों के
तुम्हारे साथ.


...कैलाश शर्मा 

Wednesday, July 16, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)

                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

      अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.४९-६०

जो आसक्तिहीन है सर्वत्र 
जीत आत्मा को है वह लेता.
विगतस्पृहा वह सन्यासी 
कर्मनिवृत्ति प्राप्त कर लेता.  (१८.४९)

नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त है करके,
कैसे वह प्राप्त ब्रह्म को करता.
जो है ज्ञान की परम उपलब्धि 
अर्जुन वह मैं संक्षेप में कहता.  (१८.५०)

विशुद्धि बुद्धि से युक्त है होकर 
संयमित आत्म धैर्य से करता.
इन्द्रिय विषयों को त्याग कर 
राग द्वेष को नष्ट है करता.  (१८.५१)

एकांतवासी व अल्प आहारी,
तन मन वाणी संयमित रखता.
ध्यान, योग में लीन सदा ही 
पूर्ण वैराग्य का पालन करता.  (१८.५२)

अहंकार बल दर्प न जाने,
काम क्रोध परिग्रह तजता.
मोहरहित शांतचित जन 
ब्रह्मभाव योग्य है बनता.  (१८.५३)

ब्रह्मभाव प्राप्त योगी को 
आकांक्षा या शोक न होता.
समभाव रख सब प्राणी में 
परमभक्ति प्राप्त है होता.  (१८.५४)

मैं जितना और जैसा हूँ 
भक्ति से है तत्व जानता.
मेरा तत्व रूप जान कर 
मुझमें ही प्रवेश है करता.  (१८.५५)

सब कर्मों को है करते भी 
जो मेरा ही आश्रय है लेता.
मेरी कृपा से है ज्ञानी जन 
परममोक्ष प्राप्त कर लेता.  (१८.५६)

सभी कर्म कर मुझे समर्पित
मुझको ही सर्वस्व मान कर.
बुद्धि योग का आश्रय लेकर
मुझमें अपना मन स्थिर कर.  (१८.५७)

मुझमें चित्त लगाकर के,
तुम दुक्खों को पार करोगे.
अहंकार तुम्हें नष्ट कर देगा 
मेरा कथन यदि नहीं सुनोगे.  (१८.५८)

अगर सोचते अहंकार वश
नहीं युद्ध करना है तुमको.
व्यर्थ सोचते प्रकृति तुम्हारी 
युद्धप्रवृत्त करेगी तुमको.  (१८.५९)

नहीं चाहते कर्म वो करना 
वशीभूत मोह के कारण.
इच्छारहित भी करना होगा 
प्रकृतिजन्य कर्म के कारण.  (१८.६०) 

          ......क्रमशः

....कैलाश शर्मा 

Wednesday, July 09, 2014

ज़िंदगी

पैरों में चुभते काँटों से 
बेख़बर ज़िंदगी,
तपती धूप में 
कार के शीशे ठकठकाती
एक रुपया मांगती 
बच्ची के फटे कपड़ों में
काले चश्मे के पीछे से 
ज़वानी ढूंढती नज़रों का
दंश झेलती ज़िंदगी,
लम्बी वातानुकूलित कार में
मालकिन की गोद में
बैठे कुत्ते की ज़िंदगी, 
एक टुकड़ा रोटी का 
कूड़े में ढूँढती 
भूखी मासूम ज़िन्दगी,
पौष की कड़कड़ाती ठंड में
भूखे पेट की आग से 
तन को तापती ज़िंदगी,
अपने मुंह का निवाला
बच्चे को खिलाती माँ
आज वृद्धाश्रम में अकेली
जीवन के दूसरे छोर पर
अँधेरे में ढूँढती ज़िंदगी।

दिखाती नये रूप
बदलती रोज़ रंग,
लगती कभी प्रिय 
कभी हो जाती बेमानी,
कागज़ पर बिखरे
बेतरतीब शब्दों सी
लगती कभी ज़िंदगी,
फ़िर भी न जाने क्यूँ
लगती हर हालात में  
अपनी सी ज़िंदगी।

...©कैलाश शर्मा 

Tuesday, July 01, 2014

एक टुकड़ा बादल

एक टुकड़ा बादल       
भटक कर अपनी राह
बरस गया मेरे आँगन में,
बुझा गया प्यास
वर्षों से तृषित अंतर्मन की.

बरसते हैं बादल आज भी
भिगो कर गुज़र जाते आँगन भी
पर प्यासा ही रह जाता अंतर्मन.

तलाशती हैं आँखें
बादल का वह टुकड़ा
गुज़रते घने बादलों में 
आज़ भी.

...कैलाश शर्मा 

Monday, June 23, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)

                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

      अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.३६-४८ 

हे अर्जुन! मैं अब तुम को 
तीन प्रकार के सुख बतलाता.
जिसमें करके रमण है साधक
मुक्ति सभी दुःख से है पाता.  (१८.३६)

विष के समान शुरू में लगता 
किन्तु अंत अमृत सम होता.
उसे ही सात्विक सुख कहते हैं 
निर्मल बुद्धि से पैदा जो होता.  (१८.३७)

विषय और इन्द्रिय का सुख है
अमृत सम प्रारम्भ में होता.
पर परिणाम दुखों का कारण 
ऐसा सुख है राजसिक होता.  (१८.३८)

आरम्भ व अंत जिस सुख का 
आत्मा को मोहित है करता.
निद्रा आलस्य प्रमाद से पैदा 
वह तामस सुख जाना जाता.  (१८.३९)

पृथ्वी, आकाश व देव में 
नहीं कोई भी ऐसा प्राणी.
प्रकृतिजन्य तीन गुणों से 
मुक्त हो जिनसे वह प्राणी.  (१८.४०)

कर्म ब्राह्मण व क्षत्रिय के 
और वैश्य शूद्रों के अर्जुन.
अलग अलग से गये हैं बांटे
स्वभावजनित गुणों के कारण.  (१८.४१)

शुचिता और इन्द्रियों पर संयम 
शांत चित्त तप क्षमा सरलता.
स्वभावजनित कर्म ब्राह्मण के 
ज्ञान विज्ञान और आस्तिकता.  (१८.४२)

तेज शौर्य धैर्य चतुराई, 
नहीं युद्ध से पीछे हटना.
कर्म स्वभाव से क्षत्रिय के 
दान भाव ईश्वर में रखना.  (१८.४३)

कृषि वाणिज्य और पशुपालन 
है स्वाभाविक कर्म वैश्यों का.
परिचर्या व सेवा करना 
स्वभावाजनित कर्म शूद्रों का.  (१८.४४)

स्वाभाविक कर्मों को करके 
मनुज प्राप्त संसिद्धि करता.
मैं बतलाता हूँ कैसे वह जन 
स्वकर्मों से सिद्धि है लभता.  (१८.४५)

जिससे सब प्राणी की उत्पत्ति
और विश्व व्याप्त यह रहता.
करके स्वकर्मों से अर्चना उसकी 
मनुज सिद्धि को प्राप्त है करता.  (१८.४६)

अपना गुणहीन कर्म भी होता 
श्रेष्ठ कुशल कर्म अन्य जन के.
नहीं पाप लगता है उसको 
स्वभावाजनित कर्म को कर के.  (१८.४७)

जन्मजनित कर्म को अर्जुन, 
दोषयुक्त हो फिर भी न तजते.
जैसे धुएँ से व्याप्त है अग्नि,
सभी कर्म दोष व्याप्त हैं रहते.  (१८.४८)

             .....क्रमशः

...कैलाश शर्मा 

Sunday, June 15, 2014

अनजाना चेहरा

नज़र बचा कर गुज़र गया वो, जैसे मैं अनजाना चेहरा,
धुंधली पड़ती नज़र ने शायद, देखा था अनजाना चेहरा.

आकर गले लिपट जाता था, ज़ब भी घर में मैं आता था,
कैसे उसको आज हो गया, मैं बस इक अनजाना चेहरा.

उंगली पकड़ सिखाया चलना, बोझ लगा न वह कंधों पर,
जब अशक्त हो गये ये कंधे, लगता उसको बेगाना चेहरा.

स्वारथ की आंधी में उजड़े, कितने बाग़ यहाँ रिश्तों के,
अब तो घर घर में दिखता है, मुझको बस अनजाना चेहरा.

नहीं प्रेम आदर जब उर में, पितृ दिवस का अर्थ न कोई,   
धुंधली आँखों को नज़र न आया, अब कोई पहचाना चेहरा.

(अगज़ल/अभिव्यक्ति)

....कैलाश शर्मा 

Tuesday, June 10, 2014

यादों का सफ़र

न लिखा था कोई ख़त 
न दिया था कोई गुलाब
न ही किया था कोई वादा,
चलते रहे थे साथ 
यूँ ही कुछ दूरी तक
अपने अपने ख्वाब 
अंतस में छुपाये।

न जाने क्यों 
न ढल पाये भाव
शब्दों में,
बदल गयीं राहें
न जाने किस मोड़ पर
कब अनजाने में।


छटपटाता है आज़ वह मौन
पश्चाताप के चंगुल में,
नहीं कोई निशानी साथ में 
कोरे हैं आज भी पन्ने,
नहीं कोई गुलाब
किताबों के बीच।

केवल ताज़ा है
वह कुछ पल का साथ
आज़ भी यादों में।

....© कैलाश शर्मा