Saturday, August 27, 2016

ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने

ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने,
मौन रह कर सभी सहा तूने।

रात भर अश्क़ थे रहे बहते,
पाक दामन थमा दिया तूने।

लगी अनजान पर रही अपनी,
दर्द अपना नहीं कहा तूने।

फूल देकर सदा चुने कांटे,
ज़ख्म अपना छुपा लिया तूने।


मौत मंज़िल सही जहां जाना,
राह को पुरसुकूँ किया तूने।

~~©कैलाश शर्मा 

Sunday, July 17, 2016

याद दे कर न तू गया होता

काश तुमसे न मैं मिला होता,
दर्द दिल में न ये पला होता।

रौनकों की कमी न दुनिया में,
एक टुकड़ा हमें मिला होता।

आसमां में हज़ार तारे हैं,
एक तारा मुझे मिला होता।

तू न मेरे नसीब में गर था,
इस जहाँ में न तू मिला होता।

ज़िंदगी कट रही बिना तेरे,
याद दे कर न तू गया होता 

नींद से टूटता नहीं नाता,
खाब तेरा न गर पला होता।

...© कैलाश शर्मा 

Tuesday, June 07, 2016

ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है

ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है,
रोज़ देती सजा सी लगती है।

रौनकें सुबह की हैं कुछ फीकी,
शाम भी बेमज़ा सी लगती है।

राह जिस पर चले थे हम अब तक,
आज वह बेवफ़ा सी लगती है।

संदली उस बदन की खुशबू भी,
आज मुझको कज़ा सी लगती है।

दर्द जो भी मिला है दुनिया में,
यार तेरी रज़ा सी लगती है।

...© कैलाश शर्मा 

Saturday, May 21, 2016

अप्प दीपो भव

बुद्ध नहीं एक व्यक्ति विशेष
बुद्ध है बोध अपने "मैं" का
एक मार्ग पहचानने का अपने आप को,
नहीं करा सकता कोई और
पहचान मेरी मेरे "मैं" से,
मिटाना होगा स्वयं ही
अँधेरा अपने अंतस का,
'अप्प दीपो भव' नहीं केवल एक सूत्र
यह है एक शाश्वत सत्य,
अनंत प्रकाश को जीवन में 
बनना होता अपना दीप स्वयं ही,
किसी अन्य का दीपक
कर सकता रोशन राह
केवल कुछ दूर तक,
फ़िर अनंत अंधकार और भटकाव
शेष जीवन राह में।

जलाओ दीपक अपने अंतस में
समझो अर्थ अपने होने का,
बढ़ो उस राह जो हो आलोकित
स्व-प्रज्वलित ज्ञान दीप से।

...© कैलाश शर्मा 

Wednesday, April 20, 2016

खून अपना सफ़ेद जब होता

खून अपना सफ़ेद जब होता,
दर्द दिल में असीम तब होता।

दर्द अपने सदा दिया करते,
गैर के पास वक़्त कब होता।

रात गहरी सियाह जब होती,
कोइ अपना क़रीब कब होता।

चोट लगती ज़ुबान से ज़ब है, 
घाव गहरा किसे नज़र होता।

बात को दफ्न आज रहने दो,
ग़र कुरेदा तो दर्द फ़िर होता।

बात कह जब पलट गया कोई,
मौन रहना नसीब बस होता

~©कैलाश शर्मा 

Thursday, February 18, 2016

क्षणिकाएं

हर खिड़की दरवाज़े से
जाते यादों के झोंके
दे जाते कभी
सिहरन ठंडक की
कभी तपन लू की।

बंद कर दीं
सब खिड़कियाँ, दरवाज़े
लेकिन जातीं दरारों से,
बहुत मुश्किल बचना
यादों के झोंकों से।

यादें कब होती मुहताज़
किसी दरवाज़े की।
*****

उधेड़ता रहा रात भर 
ज़िंदगी परत दर परत,
पाया उकेरा हर परत में
केवल तेरा अक्स,
और भी हो गए हरे
दंश तेरी यादों के।

~©कैलाश शर्मा 

Wednesday, February 03, 2016

अश्क़ जब आँख से ढला होगा

अश्क़ जब आँख से ढला होगा,
दर्द दिल का बयां हुआ होगा।

एक तस्वीर उभर आई थी,
ये पता कब धुंआ धुंआ होगा।

बात लब पर थमी रही होगी,
नज्र ने कुछ नहीं कहा होगा।

आज तक दंश गढ़ रहा यह है,
बेवफ़ा समझ के गया होगा।

चाँद का दर्द कौन समझा है,
सुब्ह चुपचाप घर गया होगा।

न कुछ हमने कहा न था तूने,
दास्ताँ कौन गढ़ गया होगा।

बारहा बात सिर्फ़ इतनी थी,
बात कहने न कुछ बचा होगा।


~©कैलाश शर्मा