गुम हो गये हैं शब्द
जीवन के कोलाहल में,
बैठे हैं मौन
तकते एक दूजे को,
कहने को बहुत कुछ
एक दूसरे की नज़रों में
पर नहीं चाहते तोड़ना
मौन अहसासों का,
छुपाते एक दूसरे से
जीवन के कोलाहल में,
बैठे हैं मौन
तकते एक दूजे को,
कहने को बहुत कुछ
एक दूसरे की नज़रों में
पर नहीं चाहते तोड़ना
मौन अहसासों का,
छुपाते एक दूसरे से
दर्द अंतस का,
अश्क़ आँखों के,
भय अकेलेपन के भविष्य का।
अश्क़ आँखों के,
भय अकेलेपन के भविष्य का।
अहसास होने या न होने का
हो जाता और भी गहन
एक दूजे के मन में
जीवन के सूनेपन में।
हो जाता और भी गहन
एक दूजे के मन में
जीवन के सूनेपन में।
....कैलाश शर्मा
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