घर के आँगन में,
आशा में
बड़े होकर देगा फल
और घनी छांव
जिसके नीचे
सुकून से बैठूँगा बुढापे में.
तेज धूप से दी उसे छांव,
जब भी देखा उसको मुरझाते
किया सिंचित और
सहलाया प्यार से,
उसको बढते देखने में ही
होगयीं सारी खुशियाँ केंद्रित.
क्या कहूँ
नियति का खेल
या मेरा प्रारब्ध,
आज वह पौधा
जब बन गया विशाल वृक्ष ,
उसके फल
मेरी पहुँच से बहुत ऊँचें,
उसकी छांव पड़ती है
दूसरे आँगन में,
और मैं खड़ा हूँ
तपती धूप में
ढूंढता ठंडक
अपनी ही परछाईं की
छाया में.


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