नहीं चाहिये मंदिर मस्ज़िद,
न गिरिजाघर , गुरुद्वारा.
मेरा ईश्वर मेरे अन्दर,
क्यों मैं फिरूं मारा मारा ?
धर्म यहाँ व्यापार हो गया,
भुना रहे हैं नाम राम का.
सीता कैदमुक्त न अब तक,
जोह रही है बाट राम का.
पका रहे सब अपनी रोटी,
मज़हब की दीवार खडी कर.
ईश्वर अल्लाह नहीं अलग हैं,
थोड़ी अपनी सोच बड़ी कर.
भूखे पेट सो रहे बच्चे,
पूछो उनसे मज़हब उनका.
शायद कल रोटी मिलजाये,
इतना ही है मज़हब उनका.
गर प्यारा है जो ऱब तुमको,
चल दुखियों को गले लगालो.
जो अनाथ लाचार हैं जग में,
उनको उँगली पकड़ उठा लो.




