Saturday, May 14, 2011

नहीं चाहिए मन्दिर मस्ज़िद

नहीं चाहिये मंदिर मस्ज़िद,
न  गिरिजाघर , गुरुद्वारा.
मेरा  ईश्वर  मेरे  अन्दर,
क्यों मैं फिरूं मारा मारा ?

धर्म यहाँ व्यापार हो गया,
भुना रहे हैं नाम राम का.
सीता कैदमुक्त न अब तक,
जोह रही है बाट राम का.

पका  रहे  सब  अपनी  रोटी,
मज़हब की दीवार खडी कर. 
ईश्वर अल्लाह नहीं अलग हैं,
थोड़ी  अपनी सोच बड़ी कर.

भूखे  पेट  सो  रहे  बच्चे,
पूछो उनसे मज़हब उनका.
शायद कल रोटी मिलजाये,
इतना ही है मज़हब उनका.

गर प्यारा  है जो ऱब तुमको,
चल दुखियों को गले लगालो.
जो अनाथ लाचार हैं जग में,
उनको उँगली पकड़ उठा लो. 

Saturday, May 07, 2011

अज़नबी गली

हुआ था एक अजीब अहसास 
अज़नबीपन का
उस गली में,
गुजारे थे जहाँ 
जीवन के प्रारम्भ के
दो दशक.

गली के कोंने पर
दुकान वही थी,
पर चेहरा नया था
जिसमें था 
एक अनजानापन.

वह मकान भी वहीं था
और वह खिड़की भी,
पर नहीं थीं वह नज़रें
जो झांकती थीं
पर्दे के पीछे से,
जब भी उधर से गुज़रता था.

नहीं  उठायी नज़र
गली में खेलते 
किसी बच्चे ने,
नहीं दी आवाज़ 
किसी खुले दरवाज़े ने.

घर का दरवाज़ा 
जहां बीता था बचपन
खड़ा था उसी तरह
पर ताक रहा था मुझको
सूनी नज़रों से.
तलाश रही थी आँखें
इंतजार में सीढ़ियों पर बैठी बहन
और दरवाज़े पर खड़ी माँ को,
लेकिन वहां था 
सिर्फ एक सूनापन.

पुराना कलेंडर 
और कॉलेज की ग्रुप फोटो
अभी भी थे दीवार पर,
लेकिन समय की धूल ने
कर दिया था 
उनको धुंधला.
छूने से 
दीवारों पर चढ़ी धूल,
उतरने लगी 
यादों की परत दर परत,
कितने हो गए हैं दूर 
हम अपने ही अतीत से.

रसोई में
टूटे चूल्हे की ईटें देख कर
बहुत कुछ टूट गया
अन्दर से.
कहाँ है वह माँ
जो खिलाती चूल्हे पर सिकी
गर्म गर्म रोटी,
और कभी सब्जी 
इतनी स्वादिष्ट होती
कि शायद ही बच पाती,
और माँ 
आँखों में गहन संतुष्टि लिये
बची हुयी रोटी
अचार से खा लेती.

अपने अपने सपनों को 
पूरे करने की चाह में,
भूल गये उन सपनों को
जो कभी माँ ने देखे थे,
और वे चली गयीं
दुनियां से,
उदास आँखों से 
ताकते
सूने घर को.

षड़यंत्रों और लालच की आंधी ने 
बिखरा दिया उस आशियाँ को
और टूट गयी वह माँ
और उसके वह सपने.
आज मैं खड़ा हूँ उस ज़मीन पर
जिस पर मेरा कोई अधिकार नहीं,
पर नहीं छीन सकता कोई
उन यादों की धूल को
जो बिखरी है 
मेरे चारों ओर.

माँ की याद 
और आशीर्वाद का साया
अब भी है मेरे साथ.
नहीं है कोई अर्थ
आने का फिर इस गली में
अज़नबी बनने को.

Saturday, April 30, 2011

क्षणिकाएं

     (१)
देख चुके जीवन में 
रंग सभी मौसम के,
इंतज़ार है
पतझड़ का,
जो उड़ा कर ले जाये
सूखे पीले पत्तों को
कहीं दूर
किसी अनज़ान सफ़र पर.

     (२)
कब तक लडेगा चाँद 
अंधियारे से,
आखिर धीरे धीरे
छुप जाता है
उसका अस्तित्व भी,
अमावस के आगोश में.

     (३)
क़ैद कर दो
ख़्वाबों को
किसी अँधेरे खँडहर में,
बहुत दुख देते हैं
टूट जाने पर.

     (४)
कुछ रिश्ते
बन जाते हैं बोझ इतना
कन्धों पर,
कि उनको ढ़ोते ढ़ोते
ज़िंदगी की आँखें भी
पथराने लगती हैं
मौत के इंतज़ार में.


Sunday, April 24, 2011

मत मांगो मेरी आँखों के आँसू

     मत मांगो मेरी  आँखों के आँसू,
     प्यासा मन प्यासा रह जायेगा.


कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे,
कितने  इन्द्रधनुष देखे  थे नदी  किनारे.
अंधकार ही सिर्फ़  धरोहर आज तुम्हारी,
कैसे सूरज को अर्पित कर दूं मैं अंधियारे.


मत छीनो मुझ से मेरे मन का सूनापन,
खुशियों का  कोलाहल ये न सह पायेगा.


साथ निभाने का वादा मैंने कब तुम से चाहा,
पर मेरी  आँखों  को  सपना  क्यों दिखलाया.
नहीं दोष  दे पाता मन  क्यों  तुम्हें आज भी,
शायद मेरा ही भ्रम था जिसने मन भटकाया.


ढूँढ  लिया  है उर ने  तुमको  इन  तारों  में,
देख तुम्हें यह भ्रमित कहीं फिर हो जायेगा.


लहर हवाले कर दी  अपनी जीवन नैया,
नहीं कोई  पतवार चाहिये, नहीं खिवैया.
आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
नहीं  चाह  कोई तट  पर यह पहुंचे नैया.


अब फिर खड़ा करो न मुझको दोराहे पर,
शायद कोई राह  न अब  उर चुन पायेगा.

Monday, April 11, 2011

सपने

पाने को छुटकारा 
मोड़ दिया था रुख
रेतीले मरुधर में,
पर कहाँ सूख पायी
तेज़ धूप में भी
सपनों की नदी,
और उग आयी
छोटी छोटी घास
फिर से किनारों पर.

अब तो 
लगता है ड़र 
इस नदी के अस्तित्व से,
न इसको तैर कर पार कर पाता,
और न यह डुबा पाती
मेरे वज़ूद को.

Friday, April 08, 2011

आज उठानी ही होगी आवाज़

आयी है आंधी
एक बार फिर
सत्याग्रह की,
उखाड़ने को जड़ से 
उन ऊँचे कटीले वृक्षों को
जो होते रहे पोषित 
भ्रष्टाचार और रिश्वत 
की खाद और पानी से.

कौन कहता है
कि गांधी नहीं रहे,
वे तो अब भी जीवित हैं 
विश्व भर की 
जनता की आवाज में,
जिन्होंने हिलादी
अहिंसा से 
निरंकुश तानाशाहों की
सत्ता.

अफ़सोस है
तो सिर्फ़ इतना
की यह सत्याग्रह का शस्त्र
उठाना पड़ रहा है
उन तथाकथित गांधीवादियों 
के खिलाफ़,
जो लगाते हैं
गांधी की तस्वीर
दफ्तर में,
लेकिन उनके कर्म
कितनी दूर हैं 
उनके आदर्शों से,
और होकर पथभ्रष्ट 
भुना रहे हैं सिक्का
उनकी शहादत का.

आज उठानी ही होगी
आवाज़,
खड़ा होना होगा सब को
भ्रष्टाचार के खिलाफ 
और देना होगा साथ
नवयुग के गांधी का,
वर्ना इतिहास 
नहीं करेगा माफ़ 
हमें कभी भी.

अर्जुन की संतानो
मत झिझको
उठाने को हथियार
सत्याग्रह का
आज
भ्रष्टाचार के कौरवों के खिलाफ़.
न मज़बूर करो
गांधी को
एक बार फिर
हमारी अकर्मण्यता 
की शर्मिंदगी से
मरने को.

Sunday, April 03, 2011

मुश्किल नहीं जो उम्र अकेले ही कटे

मैंने  सब  द्वार खुले रखे  थे अपने घर के,
बंद दर देख के खुशियाँ न कहीं मुड़ जायें.
थक गयी चौखटें सुनसान डगर तकते हुए,
बंद  करती नहीं पलकें कि नज़र आजायें.

          कितना आसान निकल जाना चुरा कर नज़रें,
          तुमको क्या इल्म जो गुज़री है किसी के दिल पर.
          इतना डर था जो ज़माने की नज़र का तुमको,
          मुस्करा कर क्यों  उठाई थी ये नज़रें मुझ पर.

अब न शिकवा,न शिकायत,न कोई गम है,
चन्द  लम्हे ही बहुत  हैं जो तेरे  साथ कटे.
देके  उम्मीद  बदल जाना  कसक देता है,
वर्ना मुश्किल नहीं जो उम्र अकेले ही कटे.