हर वर्ष नया ही होता है,
नव आशा लेकर आता है.
जो भी सोचा न कर पाया,
होकर निराश वह जाता है.
दे दिया कलंक जाते जाते,
वहशी हत्यारों ने तुमको.
अब यही सोच वह जाता है,
हो भविष्य बेहतर सबको.
क्यों दोष वर्ष किसी को दें,
जब शासन ही है हुआ भ्रष्ट.
है भरी तिजोरी धनिकों की,
लेकिन जनता भूखी व त्रस्त.
भूखा बचपन है सडकों पर,
रोटी को बिके ज़वानी है.
चिथड़ों में ढांक रही यौवन,
नव वर्ष उसे बेमानी है.
नव वर्ष समय का एक चक्र,
वह आयेगा, फिर जायेगा.
जब तक न जाग्रत होंगे हम
बदलाव न कुछ हो पायेगा.
हर आम आदमी जब अपनी
ताकत सुसुप्त पहचानेगा.
बदलेंगे तभी कलेंडर हम,
जब स्वाभिमान जग जायेगा.
© कैलाश शर्मा


