Wednesday, January 08, 2014

तनहाई

नहीं बैठता कागा
इस घर की मुंडेर पर,
नहीं सुनायी देती 
अब उसकी आवाज़,
गुज़र जाता मौन
छत के ऊपर से,
पता है उसको 
नहीं आता कोई 
इस सुनसान घर में,
नहीं चाहता जगाना 
झूठी आशा
तन्हा दिल में।


******
सुनी है कभी 
खामोशी की आवाज़ 
चीखती है सन्नाटे में 
मिटाने को अकेलापन 
सुनसान कोनों का.

.....कैलाश शर्मा

Saturday, January 04, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१६वां अध्याय)

                                    मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

           सोलहवाँ अध्याय 
(दैवासुरसम्पद्विभाग-योग-१६.१-१२) 

श्री भगवान 

अभय और चित्त की शुद्धि,
ज्ञान योग में स्थित होना.
इन्द्रियसंयम ज्ञान यज्ञ तप
सारल्य व स्वाध्यायी होना.  (१६.१)

सत्य अहिंसा त्याग शान्त
क्रोध व निंदा कभी न करना.
मृदुता दया लोक लज्जा व 
लोभ व चंचलता से बचना.  (१६.२)

तेज धैर्य क्षमा व शुचिता, 
द्रोह और अभिमान न होता.
होते गुण छब्बीस ये उसमें 
दैवीप्रकृति में जन्म जो लेता.  (१६.३)

दर्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, 
निष्ठुरता व अज्ञान हैं होते.
आसुरीप्रवृति के जो जन हैं 
उनमें ये सब दुर्गुण हैं होते.  (१६.४)

दैवी गुण मुक्ति का कारक
आसुरी प्रवृति बंधन का कारण.
शोक करो न तुम हे अर्जुन! 
दैवी गुण साथ जन्म के कारण.  (१६.५)

दैवी और आसुरी सृष्टि 
ये दो सृष्टि हुई जगत में.
दैवीप्रकृति बताई तुमको 
असुरप्रकृति कहता अब मैं.  (१६.६)

धर्म प्रवृत्ति अधर्म निवृत्ति, 
न जाने आसुरी स्वभाव जन.
होता नहीं इसलिए उनमें
शुचिता सत्य व सदाचरण.  (१६.७)

है असत्य, आधारहीन ये जग 
ईश्वर का अस्तित्व न जाने.
स्त्री पुरुष संसर्ग से जग पैदा
वर्ना काम वासना क्या माने?  (१६.८)

ऐसे विचार का आश्रय लेकर 
नष्टात्मा क्रूर कर्मों को करते.
होकर के शत्रु इस जग के 
जगत नाश का कारण बनते.  (16.9)

अतृप्त काम का आश्रय लेकर,
दम्भ मान मद युक्त हैं होते. 
दुराग्रहों के आश्रित हो कर के,
असत् कर्म में प्रवृत्त हैं होते.  (१६.१०)

रखते असीम चिंताएं अपनी 
जिनका अंत मृत्यु पर होता.
परम लक्ष्य भोगों को भोगना 
विश्वास है ऐसा उनका होता.  (१६.११)

आशाओं के बंधन में बंध के
काम क्रोध के वश में रहते.
इन भोगों की संतुष्टि को 
धन-संग्रह अन्याय से करते.  (१६.१२)           


             ............क्रमशः

....कैलाश शर्मा 

Saturday, December 21, 2013

‘शुभमस्तु... सर्व जगताम’ – एक अभिनव प्रयास

फेस बुक पर अनेक साहित्यिक ग्रुप/समूह हैं जिसके सदस्य मंच पर अपनी रचनाएँ पोस्ट करते हैं, दूसरों की रचनाएँ पढ़ते हैं और अपनी टिप्पणियां देते हैं. लेकिन फेस बुक पर ‘नवोदित साहित्यकार मंच’ एक ऐसा साहित्यिक समूह है जो इनसे बिल्कुल अलग है. यहाँ केवल सदस्य अपनी रचनाएँ ही पोस्ट नहीं करते, वे दूसरे सदस्यों के द्वारा पोस्ट की हुई रचनाओं को गंभीरता से पढ़ते हैं और उन पर अपने सार्थक सुझाव भी देते हैं. काव्य की विभिन्न विधाओं जैसे ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे आदि पर विषद चर्चा और अभ्यास के कार्यक्रम आयोजित होते हैं जिसमें वरिष्ठ रचनाकार नवोदित रचनाकारों का मार्ग दर्शन भी करते हैं. नवोदित रचनाकारों के प्रोत्साहन के लिए दिये हुए शीर्षक पर प्रति सप्ताह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है जिसमें चुने गए रचनाकारों को सम्मानित किया जाता है. मुक्तक दिवस के अतिरिक्त हल्के फुल्के ‘गपशप’ और ‘Sunday-Fun day’ जैसे कार्यक्रम सदस्यों में एक स्नेह और भाईचारे की भावना भी जाग्रत करते हैं. नवोदित रचानाकारों को प्रोत्साहित करना और उनका मार्ग दर्शन करना इस मंच का मुख्य उद्देश्य है. इसी कड़ी में मंच के २५ वरिष्ठ और नवोदित रचनाकारों की प्रतिनिधि रचनाओं को एक काव्य-संग्रह ‘सुभमस्तु...सर्व जगताम’ के रूप में काव्य प्रेमियों के समक्ष लाकर एक अभिनव और सराहनीय प्रयास किया है जिसके लिए मंच के आयोजक/प्रबंधक श्री नीरज सिंह कौरा जी, श्री दीपक कुमार नगाइच ‘रोशन’ जी एवं श्री मुकेश कुमार पंड्या जी बधाई के पात्र हैं.

‘शुभमस्तु...सर्व जगताम’ साझा काव्य-संग्रह में ओम नीरव जी, डॉ आशुतोष वाजपेयी जी, अरुन श्रीवास्तव जी, प्रमिला आर्य जी, अश्वनी कुमार शर्मा जी, सविता अगरवाल जी, पूनम सिन्हा जी, विनिता सराना जी, मुकेश कुमार पंड्या जी, अनीता मेहता जी, नीलिमा शर्मा जी, दीपिका द्विवेदी जी, सीमा अग्रवाल जी, सोहन परोहा “सलिल” जी, वैशाली चतुर्वेदी जी, डा. शैलेन्द्र कुमार उपाध्याय जी, प्रहलाद पारीक जी, नीलम मैदीरत्ता जी, श्रीकान्त निश्छल जी, यूनुस अली जी, सुरेश चौधरी जी, सुशील सरना जी, नीरज सिंह कौड़ा जी, दीपक कुमार नगाइच “रोशन” जी की तीन या अधिक रचनाएँ हैं. इस काव्य सागर में कुछ बूँदें मेरी भी हैं. काव्य संग्रह में एक ओर जहाँ वरिष्ठ रचनाकारों की रचनाएँ हैं, वहीं नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए उनकी रचनाओं को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है.

काव्य-संग्रह में सभी रचनाकारों की एक से अधिक रचनाएँ होने से प्रत्येक रचनाकार की लेखन प्रतिभा के विभिन्न आयामों, भाव सम्प्रेषण और विभिन्न काव्य विधाओं में कौशल से परिचित होने का अवसर मिला है. संग्रह में चयनित उत्कृष्ट रचनाएँ अंतस को गहराई तक छू जाती हैं. प्रत्येक रचनाकार की रचनाओं के बारे में बहुत कुछ कहने की उत्कंठा है लेकिन आलेख का बहुत लम्बा हो जाने का डर है. प्रत्येक रचना का अपना भाव है, अपना सम्प्रेषण कौशल है, अपना आकर्षण है जो स्वयं पढ़ने के बाद ही महसूस किया जा सकता है.

पुस्तक में सम्मिलित रचनाओं में विभिन्न काव्य विधाओं का दिग्दर्शन इन्द्रधनुषी सौन्दर्य पैदा करता है. ‘शुभमस्तु...सर्व जगताम’ एक बार हाथ में उठाने के बाद आप इसको पूरा पढ़े बिना नहीं रह सकते. रचनाओं में विभिन्न भावों का आवेग, एक ही जगह विभिन्न काव्य विधाओं शास्त्रीय छंद, कविता, ग़ज़ल, नज़्म और छंद-मुक्त काव्य के विभिन्न रूपों का संगम, अंतस को सराबोर कर देता है और मुंह से केवल एक शब्द निकलता है ‘वाह’.

नवोदित साहित्यकार मंच की प्रस्तुति ‘शुभमस्तु...सर्व जगताम’ निश्चय ही एक उत्कृष्ट और संग्रहणीय काव्य-संग्रह है जिसके लिए मंच के आयोजक बधाई के पात्र हैं. आशा है कि यह मंच आगे भी नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहन देने और उनकी प्रतिभा को प्रकाश में लाने का अपने प्रयास जारी रखेगा.

पुस्तक का कवर पेज सर्व धर्म समभाव की भावना को जाग्रत करता प्रथम द्रष्टि में ही आकर्षित कर लेता है जिसके लिए सविता अगरवाल जी बधाई की पात्र हैं. शुक्तिका प्रकाशन को एक उत्तम और आकर्षक पुस्तक के प्रकाशन के लिए बधाई.

पुस्तक प्राप्ति के लिए मुकेश कुमार पंड्या जी (Mob. 09929138749) या दीपक कुमार नगाइच ‘रोशन’ जी (Mob. 9460826878 / 7877617167) से संपर्क कर सकते हैं.

प्रस्तुति : नवोदित साहित्यकार मंच
मूल्य : १२५/- रुपये
प्रकाशक : शुक्तिका प्रकाशन
         ५०८, न्यू अलीपुर, मार्केट काम्प्लेक्स,
         न्यू अलीपुर,
         कोलकाता – ७०००५३
         मो. 09830010986


.....कैलाश शर्मा 

Tuesday, December 17, 2013

‘मैं’ एक समस्यायें अनेक

समस्यायें अनेक
रूप अनेक
लेकिन व्यक्ति केवल एक।
नहीं होता स्वतंत्र अस्तित्व
किसी समस्या या दुःख का,
नहीं होती समस्या 
कभी सुप्तावस्था में,
जब जाग्रत होता 'मैं'
घिर जाता समस्याओं से।

मेरा 'मैं'
देता एक अस्तित्व 
मेरे अहम् को 
और कर देता आवृत्त
मेरे स्वत्व को।
मैं भुला देता मेरा स्वत्व
और धारण कर लेता रूप 
जो सुझाता मेरा 'मैं'
अपने अहम् की पूर्ती को।

नहीं होती कोई सीमा 
अहम् जनित इच्छाओं की,
अधिक पाने की दौड़ देती जन्म 
ईर्ष्या, घमंड और अवसाद 
और घिर जाते दुखों के भ्रमर में।

'मैं' नहीं है स्वतंत्र शरीर या सोच,
जब हो जाता तादात्म्य 'मैं' का 
किसी भौतिक अस्तित्व से 
तो हो जाता आवृत्त अहम् से
और बन जाता कारण दुखों 
और समस्याओं का.

कर्म से नहीं मुक्ति मानव की
लेकिन अहम् रहित कर्म 
नहीं है वर्जित 'मैं'.
हे ईश्वर! तुम ही हो कर्ता
मैं केवल एक साधन 
और समर्पित सब कर्म तुम्हें
कर देता यह भाव 
मुक्त कर्म बंधनों से,
और हो जाता अलोप 'मैं'
और अहम् जनित दुःख।

जब हो जाता तादात्म्य
अहम् विहीन ‘मैं’ का  
निर्मल स्वत्व से, 
हो जाते मुक्त दुखों से 
और होती प्राप्त परम शांति।


….कैलाश शर्मा 

Friday, December 06, 2013

ख़्वाहिशें

रश्मि प्रभा जी और किशोर खोरेन्द्र जी द्वारा संपादित काव्य-संग्रह 'बालार्क' में सामिल मेरी रचनाओं में से एक रचना
                                                                  *****
डोर से कटी पतंग
बढ़ती स्वच्छंद
अनंत गगन में
अनभिज्ञ अपनी नियति से
कहाँ गिरेगी जाकर,
जीने दो कुछ पल
बिना डोर के बंधन के.
*****
भागते साथ भीड़ के
आता है याद
वो बरगद का पेड़,
संतुष्टि की घनी पगडंडियों
चेहरों पर,
ताकती उदास आँखों से
शहर को जाती सड़क.
*****
कितना खोया
कुछ पाने की चाहत में,
ताकता हसरत से
खुशियों से भरी सड़क
जाती गाँव को,
जो बन गयी
आज अज़नबी.
*****
कल की तलाश में
निकल जाता आज,
मुट्ठी से
रेत की तरह.


....कैलाश शर्मा 

(हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित 'बालार्क' अधिकांश ई-स्टोर्स पर उपलब्ध)

Tuesday, December 03, 2013

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (५९वीं कड़ी)

                                    मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 
          पंद्रहवां अध्याय 
(पुरुषोत्तम-योग-१५.११-२०) 

सतत साधना युक्त ही योगी 
स्व स्थित आत्म देख हैं पाते.
मूढ़ विकारी जन आत्मा को 
करके प्रयत्न भी देख न पाते.  (१५.११)

सर्व जगत प्रकाशित करता 
सूरज का वह तेज है मेरा. 
चन्द्र और अग्नि का तेज है 
उसे तेज समझो तुम मेरा.  (१५.१२)

पृथ्वी में स्थित ओज से अपने
सर्व चराचर जग धारण करता.
मैं ही रसमय सोम है बन कर,       
सब औषधियों का पोषण करता.  (१५.१३)

मैं जठराग्नि के स्वरुप में
समस्त देह में स्थित रहता.
प्राण और अपान शक्ति से  
चार अन्न का पाचन करता.  (१५.१४)

समस्त जनों के ह्रदय में स्थित 
स्मृति, ज्ञान व विस्मृति करता.
ज्ञान कराते हैं सब वेद ही मेरा 
मैं कर्ता वेदान्त व वेदों का ज्ञाता.  (१५.१५)

केवल दो ही पुरुष लोक में,
उनको क्षर व अक्षर कहते.
सब प्राणी की संज्ञा क्षर है 
जीवात्मा अक्षर हैं कहते.  (१५.१६)

उत्तम पुरुष भिन्न दोनों से 
उसको है परमात्मा कहते.
निर्विकार रह कर भी ईश्वर 
तीनों लोकों का पोषण करते.  (१५.१७)

क्योंकि मैं क्षर से ऊपर हूँ
व अक्षर से भी उत्तम.
अतः लोक और वेदों में 
जाना जाता मैं पुरुषोत्तम.  (१५.१८)

बुद्धिमान जन हे भारत!
मुझको पुरुषोत्तम रूप जानता.
वह समग्र सर्वज्ञ भाव से 
केवल मेरा ही है अर्चन करता.  (१५.१९)

मैंने गुह्य सम्पूर्ण शास्त्र है
तुमको बता दिया है अर्जुन.
हो जाता कृतकृत्य जान कर
जिसको बुद्धिमान ज्ञानी जन.  (१५.२०)

**पंद्रहवां अध्याय समाप्त**

                .....क्रमशः

....कैलाश शर्मा 

Thursday, November 28, 2013

तलाश अस्तित्व की

तलाश करो स्वयं
अपने स्वयं का अस्तित्व 
अपने ही अन्दर
न भागो अपने आप से,
तुम्हारा अपना स्वत्व ही 
तुम्हारा मित्र या शत्रु,
प्रज्वलित होती अग्नि 
अच्छाई या बुराई की
स्वयं अपने अंतस में,
व्यर्थ है दोष देना

किसी बाहरी शक्ति को।

दिखाता रास्ता अपना ही 'मैं'
आगे बढ़ने का जीवन राह में।


....कैलाश शर्मा