Saturday, September 05, 2015

ऊधो, कहाँ गये मेरे श्याम

**श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं**   

ऊधो, कहाँ गये मेरे श्याम।
श्याम बिना कैसे मन लागे, अश्रु बहें अविराम।     
कछू न भावत है जग माहीं, बिन सूरत अभिराम।      
ज्ञान लगे नीरस इस मन को, ढूंढ रहा मन श्याम।       
अब तो आन मिलो हे कान्हा, सूना है बृज धाम।            
निकस न पायें प्राण हमारे, बिना दरस के श्याम।          
हुआ कठोर तुम्हारा मन क्यों, ऐसे कब थे श्याम।

...©कैलाश शर्मा

Thursday, August 27, 2015

शब्दों का मौन

अंतस का कोलाहल
रहा अव्यक्त शब्दों में,
कुनमुनाते रहे शब्द
उफ़नते रहे भाव
उबलता रहा आक्रोश
उठाने को ढक्कन 
शब्दों के मौन का।

बहुत आसान है 
फेंक देना शब्दों को 
दूसरों पर आक्रोश में,
हो जाते शब्द
शांत कुछ पल को 
हो जाती संतुष्टि अभिव्यक्ति की।

होने पर शांत तूफ़ान 
डूबने उतराने लगते शब्द
पश्चाताप के दलदल में,
हो जाता और भी कठिन 
निकलना इस दलदल से।


कब होता है शाश्वत
अस्तित्व तूफ़ान का,
बेहतर है सहलाना शब्दों को 
बहलाना रहने को मौन
तूफ़ान के गुज़र जाने तक।

....©कैलाश शर्मा

Thursday, August 13, 2015

बंजारा

जग से है क्यूँ मोह बढाता
कौन हुआ किसका बंजारा।
मिले काफ़िले उन्हें भुला दे 
कौन साथ चलता बंजारा।

कौन रुका है यहाँ सदा को
कौन ठांव होता अपना है।
सभी मुसाफ़िर हैं सराय में
एक एक सबको चलना है।
पल भर हाथ थाम ले काफ़ी
सदा साथ सपना बंजारा।

अच्छा बुरा कौन है जग में
जो भी मिलता साथ उठाले।
कौन है अपना कौन पराया
जो भी मिलता गले लगाले।
छोड़ यहीं जब सब जाना है
क्यूँ है फ़िर चुनता बंजारा।


आज़ नहीं, न कल था तेरा
आने वाला कल क्या होगा। 
मेहंदी रचा हाथ में कोई
इंतज़ार कब करता होगा।
थके क़दम पर नहीं है रुकना
नियति तेरी चलना बंजारा।

......©कैलाश शर्मा

Sunday, July 19, 2015

यादें

कैसा था ज़ुनून
दूर होने का तुम्हारी यादों से,
दफ़ना दिए सब ख़्वाब
कुचल दिया वह दिल
जिसमें बसाया तुम्हें,
खरोंच दी परतें ज़िस्म से
पर फ़िर भी रही बाक़ी
चुभन तेरी छुवन की,
अहसास तेरे होने का
रोम रोम में ज़िस्म के।


शायद घुल गयी तेरी यादें
बूँद बूँद में लहू के
देतीं पल पल दर्द
तेरे न होने पर भी अहसास होने का,
ढोना ही होगा ताउम्र
यह बोझ तेरी यादों का।

...कैलाश शर्मा 

Friday, July 03, 2015

जीवन

कानों को फोड़ता
शोर सन्नाटे का,
चीत्कार दमित शब्दों की 
छुपी मौन अंतस में,
चुभता आँखों में
काला गहरा अंधियारा,
मांगता तनहाई से
कुछ पल साथ तनहा मन,
कितना अज़ीब फ़लसफ़ा
हर बाहर जाती श्वास
निर्भर वापिस आने को
मृत्यु के अहसान पर।

....कैलाश शर्मा 

Sunday, June 14, 2015

पगडंडी

मत ढूंढो पगडंडियां
बनायी औरों की 
सुखद यात्रा को,
बनाओ अपनी पगडंडी
और चुनो अपनी 
एक नयी मंज़िल.

जरूरी तो नहीं सही हो
हर भीड़ वाली राह,
क्यूँ बनते हो हिस्सा 
किसी काफ़िले का,
मत चलो किसी के पीछे
थाम कर हाथ उसकी सोच का,
जागृत करो अपनी सोच
अपना आत्म-चिंतन,
समेटो अपनी बांहों में
स्व-अर्जित अनुभव
बनाओ स्वयं अपनी पगडंडी
अपनी मंज़िल को,
खड़े हो धरा पर
अपने पैरों पर अविजित।

...कैलाश शर्मा 

Thursday, June 04, 2015

भटकते शब्द

मन से मन का संवाद
कुंवारी साँसों का स्पंदन,
विस्तार स्वप्नों का
आँखों से आँखों तक,
अनछुए स्पर्श की
सनसनाहट रग रग में,
अंतस के अहसासों की
एक चमक नज़रों में,
हो गए सब बेमानी
न व्यक्त होने से केवल शब्दों में।

देखता है खड़ा दूर से
बना अनजान हालात से
चहुँ ओर घूमते शब्दों को
नहीं आ पाए जो कभी हाथ में
और आज खो दिया अर्थ
होने या न होने का

....© कैलाश शर्मा